शताब्दी राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन आगामी 3 व 4 फरवरी, 2024 को प्रस्तावित

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प्रहलाद पाण्डेय
वाराणसी/संसद वाणी : काशी हिंदू विश्ववि‌द्यालय के विधि संकाय का यह शताब्दी वर्ष है। हम इस शताब्दी वर्ष को शैक्षणिक चर्चाओं और विमशाँ के साथ विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से मना रहे हैं। इसी कड़ी में भारतवर्ष में विधिक शिक्षा पुनरावलोकन एवं संभावना विषय पर शताब्दी राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन आगामी 3 व 4 फरवरी, 2024 को प्रस्तावित है।
प्रत्येक समाज अपने सामाजिक जीवन को सरल, सुगम और व्यवस्थित बनाने के लिए विधिक दर्शन, विधिक और न्यायिक प्रक्रियाओं का निर्माण करता है। दर्शन, विधान और प्रक्रिया किसी राष्ट्र के लिए तभी लाभकारी और प्रभावी होगी जब वह राष्ट्र जीवन के दृष्टिकोण और विश्वास पर आधारित हो। भारतवर्ष की 800 वर्षों की प्रशासनिक पराधीनता के कारण हम अपने ‘स्व’ पर आधारित विधिक सोच, दर्शन और न्यायिक प्रक्रियाओं को भूल गए हैं। इस कारण विधि शिक्षा, अनुसंधान एवं विधि व्यवस्था की समसामयिक दशा एवं दिशा भारत केन्द्रित न होकर पाश्चात्य हो गयी है। विधिक जांच, विधिक अनुसंधान और शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव के बाद ही व्यवस्था में परिवर्तन शुरू होगा।
यद्यपि, हमारी आजादी के 75 वर्षों के बाद भी, हम न्यायशास्त्र या विधिक शिक्षा पर आधारित स्वदेशी या भारतीय स्कूल विकसित नहीं कर पाए हैं। कोई भी विधिक प्रणाली जिसमें समाज के मूल चरित्र का अभाव है, अंततः समाज के परिवर्तन के दौरान समय की कसौटी पर विफल हो जाएगी। भारत में समकालीन विधिक शिक्षा प्रायः औपनिवेशिक विचारों से प्रभावित रही है। न केवल विधि को उपनिवेश से मुक्त करना बल्कि उसी संदर्भ में विधिक शिक्षा को मौलिक रूप से पुनर्गठित करना भी एक भारतीय अनिवार्यता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के पैरा 20.4 में आगे कहा गया है कि “विधिक अध्ययन के पाठ्यक्रम में सामाजिक-सांस्कृतिक सदर्भों के साथ-साथ, साक्ष्य-आधारित तरीके से, विधिक सोच का इतिहास, न्याय के सिद्धांत और न्यायशास्त्र का अभ्यास प्रतिबिंबित होना चाहिए। विधिक शिक्षा प्रदान कराने वाले राज्य संस्थानों को भविष्य के अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों के लिए ‌द्विभाषी शिक्षा प्रदान करने पर विचार करना चाहिए।
उपरोक्त संदर्भ में. विधिक शिक्षा जगत के समक्ष कुछ महत्वपूर्ण बिंदु पश्न हैं। क्या वर्तमान विधिक/न्यायिक प्रणाली में प्रयुक्त शब्दावली और प्रक्रियाएं भारतीय मानस, परंपरा और दर्शन के अनुकूल हैं। किन संदभी, उदाहरणों और परिभाषाओं के माध्यम से हम आधुनिक विधिक शिक्षा में नई अतईष्टि विकसित कर सकते हैं? विधिक शिक्षा के इस क्षेत्र में क्या सुधार प्रस्तावित किए गए हैं? यदि इन सुधार प्रस्तावों को अपनाया जाता है. तो वे विधि और विधिक शिक्षा को व्यावहारिक और वैचारिक रूप से कैसे आकार देंगे हम यहाँ से वहाँ कैसे पहुँचेंगे?
यह सर्वमान्य तथ्य है कि भारत की वर्तमान विधिक शिक्षा को आधुनिक रूप में प्रारंभ करने का श्रेय काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विधि संकाय को जाता है। यहां विधि की शिक्षा की पढ़ाई का प्रारभ 1923 से हुआ और इसका उ‌द्घाटन सर आशुतोष मुखर्जी, प्रख्यात कानूनविद ने किया था। आगे चलकर प्रो. आनंदजी ने 1960 के दशक में पूरे भारतवर्ष को 3 वर्षीय एलएलबी पाठ्यक्रम दिया। साथ ही यहां पर 1965 से ही सेमेस्टर प्रणाली लागू की गई। हम लोगों ने विधिक संस्था के रूप में तमाम प्रायोगिक विषयों को विधिक शिक्षा में प्रवेश कराया। यहां से निकले विद्यार्थियों ने सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय तथा जिला न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में, अधिवक्ता के रूप में तथा शिक्षा जगत में अध्यापक के रूप में राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। हम इस शताब्दी सम्मेलन में कुछ प्रबुद्ध विद्वानों को आमंत्रित कर विधिक शिक्षा के परिपेक्ष को इस बाजारवादी युग में पुनः परिभाषित करना चाह रहे हैं।

इस सम्मेलन में निम्न वरिष्ठ आचार्य अपने विचारों को व्यक्त करेंगे।

प्रो. एन.एल. मित्रा, पूर्व कुलपति एनएलयू बैंगलोर (सम्मानित अतिथि और मुख्य वक्ता)

प्रो. आर. वेंकट राव, कुलपति. इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लीगल एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईयूएलईआर) गोवा

डॉ. बी.सी. निर्मल. पूर्व प्रमुख एवं डीन, विधि संकाय, बीएचयू एवं पूर्व कुलपति एनयूएसआरएल, रांची

प्रो. (डॉ.) उषा टंडन, कुलपति, डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, प्रयागराज

प्रो. (डॉ.) योगेश प्रताप सिंह, कुलपति, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी त्रिपुरा

  • प्रो. (डॉ.) अंजू वली टिकू, डीन, विधि संकाय, विधि विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय प्रो. ब्रजकिशोर स्वाई, डॉ. पी. वी काणे गोल्ड मेडल के प्राप्तकर्ता

प्रो. अमर पाल सिंह, पूर्व डीन, यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ एंड लीगल स्टडीज, आईपी यूनिवर्सिट

  • प्रो. हरिवंश दीक्षित, संकाय प्रमुख, लॉ कॉलेज, तीर्थकर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद

और भी कई.

विधिक शिक्षा के जगत में हमारी प्रमुख उपलब्धियां –

तीन वर्षीय तथा 6 सेमेस्टर युक्त एलएलबी पाठ्यक्रम शुरू करने

वाला देश का प्रथम संस्थान

  • दो वर्षीय एलएलएम पाठ्यक्रम शुरू करने वाला देश का पहला संस्थान

दो वर्षीय एलएलएम (एचआरडीई) पाठ्यक्रम शुरू करने वाला देश का पहला संस्थान

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