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अंधेरी से लेकर बोरीवली तक अगर आप सड़क के किनारे थोड़ी देर खड़े होकर शहर के तथाकथित “विकास” को देखना चाहें, तो आपको एक ही दृश्य बार-बार दिखाई देगा—फुटपाथ पर कब्ज़ा, अवैध पार्किंग और प्रशासन की रहस्यमयी खामोशी।
जहां एक ओर बड़े-बड़े वीआईपी रेस्टोरेंट और कार शोरूम अपनी गाड़ियों से पार्किंग की जगह घेर लेते हैं, वहीं बची-खुची जगह पर ठेले और फेरीवाले कब्ज़ा कर लेते हैं। नतीजा यह होता है कि जिस फुटपाथ को पैदल चलने वालों के लिए बनाया गया था, वही आज उनके लिए सबसे असुरक्षित जगह बन चुका है।
लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ (वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सब प्रशासन की नजरों से छिपा हुआ है? जवाब साफ है—नहीं। यह सब कुछ हो रहा है प्रशासन की सीधी निगरानी में।
मुंबई में सड़क व्यवस्था और वाहन पार्किंग की जिम्मेदारी जिस विभाग पर है, वह है Regional Transport Office Mumbai और फुटपाथ व अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी जिस संस्था पर है, वह है Brihanmumbai Municipal Corporation। लेकिन सवाल यह है कि जब जिम्मेदार विभाग मौजूद हैं, तो अंधेरी से लेकर बोरीवली तक यह अराजकता आखिर क्यों कायम है?
सूत्रों की मानें तो इस पूरे खेल की जड़ में “हफ्ता व्यवस्था” बताई जाती है। आरोप यह भी हैं कि अगर कोई नागरिक फुटपाथ पर लगे ठेलों की शिकायत बीएमसी से करता है, तो कार्रवाई से पहले ही संबंधित लोगों को सूचना मिल जाती है। नतीजा—अधिकारी पहुंचने से पहले ठेले गायब और कार्रवाई सिर्फ कागजों में दर्ज।
यही हाल अवैध पार्किंग के मामलों में भी देखने को मिलता है। जब शिकायत Regional Transport Office Mumbai तक पहुंचती है, तो चेकिंग के दौरान सड़कें अचानक खाली नजर आती हैं। लेकिन जैसे ही अधिकारी आगे बढ़ते हैं, कुछ ही मिनटों में वही वाहन दोबारा सड़क किनारे खड़े मिलते हैं।
यह सवाल अब मुंबई के आम नागरिकों के मन में उठने लगा है कि क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही है या फिर मिलीभगत का एक व्यवस्थित तंत्र?
क्योंकि अगर कार्रवाई सच में सख्ती से की जाए तो किसी भी अवैध पार्किंग या फुटपाथ कब्जे को जड़ से खत्म करना असंभव नहीं है। लेकिन यहां तो कार्रवाई भी ऐसी होती है मानो सिर्फ “दिखावे” के लिए हो—आज हटाया, कल फिर वही हाल।
कटाक्ष यही है कि मुंबई में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर हकीकत यह है कि पैदल चलने के लिए बनी जगह भी सुरक्षित नहीं बची।
अगर यही “विकास मॉडल” है, तो फिर यह सवाल पूछना गलत नहीं होगा कि शहर किसके लिए बन रहा है—आम नागरिकों के लिए या अवैध कब्जों के लिए?
और जब तक जिम्मेदार विभाग इस सवाल का ईमानदारी से जवाब नहीं देते, तब तक अंधेरी से बोरीवली तक का यह “विकास” शायद इसी तरह फुटपाथ पर खड़ा नजर आएगा।