कोटद्वार में मीडिया के प्रवेश पर लगाया गया प्रतिबंध कोई साधारण प्रशासनिक फैसला नहीं है। यह उस मानसिकता का आईना है, जहाँ सवाल पूछना अपराध और हंगामा करना अधिकार बनता जा रहा है।
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ • (वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
विडंबना देखिए— जहाँ 100 से ज्यादा लोगों की भीड़ खुलेआम नारेबाज़ी करती है, गालियाँ देती है, धमकियाँ देती है, वहाँ शांति भंग नहीं मानी जाती। लेकिन जहाँ कैमरा पहुँचना चाहता है, वहाँ “कानून-व्यवस्था” अचानक जाग जाती है।
वीडियो सबूत मौजूद, फिर भी FIR गायब—क्यों?
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो किसी कल्पना का हिस्सा नहीं हैं। उनमें साफ़ दिखता है कि—
कौन लोग मौके पर मौजूद थे
कौन धमकी दे रहा था
कौन एक दुकानदार पर दबाव बना रहा था
इसके बावजूद उत्तराखंड पुलिस की कलम FIR लिखने से कांपती दिखी। सवाल यह नहीं कि FIR क्यों नहीं हुई, सवाल यह है कि क्या पुलिस यह तय कर रही है कि कानून किस पर लागू होगा और किस पर नहीं?
जब पुलिस ही बजरंगदल की मांग को “सही” बताने लगे
सबसे डरावना दृश्य वह है, जहाँ पुलिस अधिकारी बजरंगदल के कार्यकर्ता की मांगों को “उचित” ठहराते दिखाई देते हैं। यह वही क्षण है, जहाँ कानून अपनी वर्दी उतार देता है और डर या दबाव की वर्दी पहन लेता है।
कटाक्ष कड़वा है, लेकिन सटीक— अब थाने में कानून नहीं, संख्या गिनी जा रही है।
नाम बदलवाने की राजनीति: अगला नंबर क्या पहचान पत्र का है?
दुकान के नाम को लेकर दबाव बनाना सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। आज नाम बदला जा रहा है, कल शायद कपड़े, परसों खान-पान, और फिर सोचने का तरीका।
क्या अब भारत में व्यवसाय करने के लिए यह बताना ज़रूरी होगा कि नाम किस धर्म से जुड़ा है? अगर ऐसा है, तो यह विकास नहीं—विभाजन का खुला एलान है।
मीडिया पर पाबंदी: सच से डर किसे है?
मीडिया को रोका गया, हंगामा करने वालों को नहीं। यह फैसला अपने आप में स्वीकारोक्ति है कि समस्या हंगामे में नहीं, उसकी कवरेज में थी।
लोकतंत्र में मीडिया आईना होता है। और जब आईना ढक दिया जाए, तो समझ लीजिए— चेहरा देखने लायक नहीं बचा।
उत्तराखंड पुलिस पर तीखी टिप्पणी
उत्तराखंड पुलिस से जनता यह उम्मीद करती है कि वह संविधान की रक्षा करे, न कि किसी संगठन की भावनाओं की। लेकिन कोटद्वार की घटना में पुलिस का रवैया यह संकेत देता है कि—
या तो पुलिस असहाय है, या फिर इच्छाशक्ति से खाली।
दोनों ही स्थितियाँ लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं।
सत्ता की चुप्पी भी एक बयान होती है
यह भी संयोग नहीं कि ऐसी घटनाएँ बार-बार उन्हीं जगहों पर सामने आती हैं, जहाँ सत्ता का रंग गाढ़ा है। चुप्पी, कार्रवाई से ज़्यादा बोलती है। और यहाँ चुप्पी बहुत कुछ कह रही है।
अंत में—एक असहज लेकिन ज़रूरी सवाल
क्या सरकार और प्रशासन यह इंतज़ार कर रहे हैं कि कोई बड़ा हादसा हो, तभी नींद टूटे?
क्योंकि इतिहास गवाह है— जब समय रहते भीड़ को नहीं रोका गया, तो बाद में सिर्फ मलबा गिना गया।
कोटद्वार की घटना एक चेतावनी है। अगर आज भी सवालों को दबाया गया, तो कल जवाब आग की भाषा में आएंगे।
और तब यह कहने का मौका नहीं मिलेगा कि “हमें अंदाज़ा नहीं था।”