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7 months agoon
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SANSAD VANI
भारत में भ्रष्टाचार कोई नई समस्या नहीं है। यह व्यवस्था के हर कोने में घुसपैठ कर चुका है, और मुंबई के मालवणी इलाके में यह समस्या और भी गंभीर रूप ले चुकी है। यहां पुलिस और म्हाडा (महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) के अधिकारी न केवल शिकायतों को नजरअंदाज कर रहे हैं, बल्कि अवैध कार्यों को संरक्षण देकर आम नागरिकों की जान जोखिम में डाल रहे हैं। एक सामाजिक कार्यकर्ता की गुहार और स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स से सामने आ रही यह कहानी बताती है कि कैसे सिस्टम की कमजोरी भ्रष्टाचार को पनपने का मौका दे रही है। यदि कोई व्यक्ति इन भ्रष्ट अधिकारियों को सुधारने की कोशिश करे, तो यह एक अंतहीन और थकाऊ जंग बन सकती है, जो पूरे जीवन को व्यर्थ कर दे।
मालवणी के सामना नगर, गेट नंबर 8 पर एक फेडरेशन ने अवैध पार्किंग व्यवस्था कर पूरे रोड को ब्लॉक कर दिया है। यह न केवल ट्रैफिक को जाम करता है, बल्कि किसी दुर्घटना की स्थिति में फायर ब्रिगेड या एम्बुलेंस का पहुंचना असंभव हो जाता है। स्थानीय निवासियों की आवाज बनकर मीडिया के स्वामी ने जब मालवणी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी चिमजी से मुलाकात की और इसकी शिकायत की, तो उनका जवाब सुनकर सभी हैरान रह गए। चिमजी ने कहा, “जब दुर्घटना होगी, तब कार्रवाई करेंगे। उससे पहले कुछ नहीं कर सकते।”
यह सुनकर सवाल उठता है – क्या अधिकारियों का काम घटनाओं को रोकना नहीं, बल्कि उनका इंतजार करना है? और तो और, जब इस मुद्दे पर मीडिया ने कवरेज की, तो चिमजी ने मीडिया स्वामी को धमकी दी: “अगर आप इसमें पाए गए, तो आपको भी नहीं छोड़ेंगे।” एक तरफ जहां नागरिक अवैध कार्य बंद करवाने और लोगों की जान बचाने के लिए गुहार लगा रहे हैं, वहीं अधिकारी उल्टा उन्हें ही धमकाने लगते हैं। दुख की बात यह है कि ऐसे अधिकारियों को ही नेताओं द्वारा सम्मानित किया जाता है और प्रमोशन दिया जाता है। यह सिस्टम की विडंबना है, जहां लापरवाही को इनाम मिलता है।
मालवणी पुलिस में एक और उदाहरण है एपीआई अमृता देशमुख और पीएसआई प्रफुल मिसाल का। इन दोनों अधिकारियों को किसी का डर नहीं लगता, क्योंकि कथित तौर पर मुंबई पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी इनके साथ खड़े हैं। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बीएमसी अधिकारी को शिकायत की कि फेडरेशन के अध्यक्ष और सचिव ने दिवाल खड़ी करने के लिए कई पेड़ों की जड़ें कटवा दिए हैं। बीएमसी ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए जांच की और मालवणी पुलिस को लिखित शिकायत भेजी।
लेकिन शिकायत के बाद कई महीनों तक फाइल धूल खाती रही। जब कार्यकर्ता ने आरटीआई दाखिल की, तो अमृता देशमुख का “जमीर जागा”। उन्होंने फेडरेशन के खिलाफ एनसी (नॉन-कॉग्निजेबल) दर्ज की, लेकिन इसमें भी 3 महीने लग गए। जब कार्यकर्ता ने कारण पूछा, तो देशमुख नाराज हो गईं और चिल्लाईं, “क्या मैं सिर्फ तुम्हारे लिए बैठी हूं?” मीडिया को भी उन्होंने खरी-खोटी सुनाई। बाद में माफी मांगी और कार्रवाई का आश्वासन दिया, लेकिन एनसी दर्ज होने के सात महीने बाद भी एफआईआर नहीं हुई।
जब दोबारा सवाल किया गया, तो देशमुख ने जिम्मेदारी पीएसआई प्रफुल मिसाल पर डाल दी। मीडिया ने मिसाल से पूछा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। आरटीआई में मिसाल ने कहा कि एनसी दर्ज हो चुकी है और एफआईआर जल्द होगी, लेकिन तीन महीने के विलंब का जवाब नहीं दिया। मीडिया के लीगल टीम द्वारा मुंबई के पुलिस कमिश्नर को शिकायत की गई, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं। अमृता देशमुख और प्रफुल मिसाल आज भी मालवणी पुलिस में तैनात हैं और मनमानी जारी रखे हुए हैं। यह घटना बीएमसी की वन संरक्षण नीतियों की उपेक्षा को भी उजागर करती है, जहां पेड़ काटने की अनुमति बिना जांच के दी जाती है।
अब बात म्हाडा अधिकारियों की। एक उपनिबंधक को शिकायत मिली कि मालवणी स्वप्नपूर्ति सोसायटी के अध्यक्ष बालासाहेब भगत 14 वर्षों से लगातार पद पर बैठे हैं। वे ऑटो रिक्शा चालक हैं, लेकिन कई संपत्तियों के मालिक बन चुके हैं। उपनिबंधक ने जांच बैठाई, जिसमें म्हाडा के अधिकारी महाजन ने सोसायटी को दोषी ठहराया और फाइल सबमिट की। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, उपनिबंधक बीएस कटरे ने भगत को निर्दोष साबित कर दिया। कारण पूछने पर कोई जवाब नहीं।
इसके बाद भगत ने फेडरेशन बनाकर म्हाडा की सरकारी जमीन पर अवैध पार्किंग और निर्माण शुरू कर दिया। म्हाडा क्षेत्र निर्माण गोरेगांव के अधिकारियों ने नोटिस जारी कर पार्किंग बंद करवाई और एक अवैध निर्माण ध्वस्त कर 1 लाख 8 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। लेकिन उसके बाद सब शांत। जब अधिकारी मकाने से पूछा गया कि फेडरेशन अध्यक्ष-सचिव पर एफआईआर क्यों नहीं, तो उन्होंने कहा – दो दिन में मालवणी पुलिस को पत्र भेज देंगे। 20 दिन बीत गए, पत्र नहीं भेजा। दोबारा पूछने पर बोले, “वरिष्ठ अधिकारी संदीप कालंबे मना कर रहे हैं।” कालंबे से बात की, तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया। इससे साफ है कि मकाने फेडरेशन को बचा रहे हैं। क्या इन्हें भ्रष्ट नहीं कहेंगे?
इस लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि मालवणी ओम सिद्धिविनायक सोसायटी ने भी अवैध निर्माण शुरू कर दिया। मकाने को जानकारी है, लेकिन कार्रवाई शून्य। म्हाडा की ऐसी घटनाएं सिस्टम की गहरी खामियों को दर्शाती हैं, जहां सरकारी जमीन पर कब्जा आसान हो जाता है।
सरकार ने सारी शक्तियां अपने पास रख ली हैं। आम नागरिक को सिर्फ शिकायत करने की आजादी है, लेकिन उसके बाद कुछ नहीं। आरटीआई, मीडिया, उच्च अधिकारियों तक पहुंच – सब व्यर्थ। इस स्थिति को बदलने के लिए न केवल कड़े कानून चाहिए, बल्कि उनकी सख्ती से अमल और पारदर्शी जवाबदेही भी। भ्रष्टाचार पर अंकुश तभी लगेगा, जब अधिकारी जवाबदेह होंगे।
मालवणी जैसे इलाकों में रहने वाले हजारों नागरिकों की आवाज दब रही है। क्या समय नहीं आ गया है कि सिस्टम खुद को सुधारे? अन्यथा, यह भ्रष्टाचार का चक्र कभी नहीं रुकेगा। यदि आप भी ऐसी समस्या का सामना कर रहे हैं, तो आवाज उठाएं – क्योंकि चुप्पी ही भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा हथियार है।
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