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• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ • (वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
मुंबई को सपनों का शहर कहा जाता है, और इस शहर की रीढ़ मानी जाती है—’मुंबई पुलिस’। आम नागरिक रात को चैन की नींद इसलिए सोता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि सड़कों पर खाकी वर्दी में तैनात अधिकारी उसकी सुरक्षा और न्याय के लिए चौबीसों घंटे तत्पर हैं। कठिन परीक्षाओं को पास कर, वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद जब ये अधिकारी पद संभालते हैं, तो जनता उनसे निष्पक्षता, संवेदनशीलता और त्वरित न्याय की उम्मीद रखती है। लेकिन जब वही खाकी अपनी जवाबदेही से पूरी तरह पल्ला झाड़ ले, तो आम इंसान का विश्वास भीतर तक हिल जाता है।
मालवणी पुलिस स्टेशन से सामने आया हालिया घटनाक्रम केवल एक लापरवाही की कहानी नहीं है, बल्कि उस गिरते प्रशासनिक स्तर का दर्पण है जहाँ जनता को न्याय की जगह गोलमोल बहाने थमा दिए जाते हैं।
🏛️ जब सरकारी पत्र पर 3 महीने जमती रही धूल
मामला मालवणी में 5 सोसायटियों को मिलाकर बने ‘डॉ. अब्दुल कलाम फेडरेशन’ के पदाधिकारियों द्वारा दीवार निर्माण के नाम पर हरे-भरे पेड़ों की जड़ें काटने का था। जब पर्यावरण प्रेमियों ने आवाज उठाई और बीएमसी (BMC) ने अपनी जांच में इस जुर्म को शत-प्रतिशत सच पाया, तो 11 जनवरी 2025 को बीएमसी ने मालवणी पुलिस को लिखित कार्रवाई के लिए भेजा।
सोचिए, बीएमसी जैसी सरकारी संस्था का पत्र मिलने के बाद भी मालवणी पुलिस को महज एक NC दर्ज करने में पूरे 3 महीने लग गए! जब इस घोर ढिलाई पर मेरे द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत तीखे सवाल पूछे गए कि 3 महीने की देरी क्यों हुई और क्या पुलिस ने कोर्ट में एफआईआर दर्ज कराने के लिए अर्जी दी? — तो जो जवाब आया, उसने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए।
⚖️ लीगल टीम का स्पष्ट तर्क और पुलिस की टालमटोल
जांच अधिकारी अमृता देशमुख का कहना था कि “यह विषय मेरा नहीं, बल्कि पीआई प्रफुल का था; मैंने तो बस NC फाइल की और उन्हें हैंडओवर कर दिया।”
जब इस विषय पर हमने अपनी लीगल टीम (Legal Team) से गहन चर्चा की, तो कानूनी विशेषज्ञों का रुख बेहद स्पष्ट था। लीगल टीम का साफ कहना है कि जब आधिकारिक तौर पर NC दर्ज करने वाली अधिकारी अमृता देशमुख हैं, तो आगे की विधिक कार्रवाई की जिम्मेदारी भी प्राथमिक रूप से उन्हीं की बनती है। किसी दूसरे अधिकारी का नाम लेकर जिम्मेदारी से भागना कानूनी और नैतिक रूप से पूरी तरह गलत है।
दूसरी बड़ी बात—जब शिकायतकर्ता बीएमसी है और बीएमसी ने जांच रिपोर्ट सौंपी है, तो NC दर्ज करने के बाद कोर्ट में अर्जी (Permission Application) देकर उसे FIR में बदलने का काम मालवणी पुलिस का था, न कि शिकायतकर्ता या आम जनता का! लेकिन आरटीआई में पुलिस का यह लिख देना कि “शिकायतकर्ता कोर्ट जाकर राहत ले”, यह दर्शाता है कि पुलिस अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी आम जनता की जेब और समय पर डालना चाहती है।
❓ क्या हम वाकई सुरक्षित हैं?
आज सवाल सिर्फ एक मामले या एक पेड़ का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जो अधिकारियों के भीतर घर कर चुकी है। क्या अधिकारी सिर्फ ट्रांसफर होने तक फाइलों को दबाने के लिए बैठे हैं? क्या जनता का टैक्स सिर्फ इसलिए जा रहा है कि जब वे अपनी समस्याओं के समाधान के लिए जाएं, तो उन्हें एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के धक्के खाने पड़ें?
RTI जैसे मजबूत कानून को भी जब रबर स्टैंप की तरह इस्तेमाल किया जाने लगे और बिना सोचे-समझे जवाब भेज दिए जाएँ, तो यह एक बेहद गंभीर स्थिति है।
हम आज भी मुंबई पुलिस के गौरवशाली इतिहास का सम्मान करते हैं, लेकिन मालवणी पुलिस का यह ढुलमुल रवैया जनता के मन में यह खौफनाक सवाल छोड़ जाता है—“जब रक्षक ही नियमों को ठेंगा दिखाने लगें, तो हम किसके भरोसे सुरक्षित हैं?”
समय आ गया है कि पुलिस कमिश्नर और आला अफसर इस टूटते विश्वास को बचाएँ और जवाबदेही तय करें!
संपादकीय टिप्पणी: न्याय में देरी, न्याय न देने के बराबर है। जब तक लापरवाह अधिकारियों पर सख्त विभागीय कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम नागरिक का विश्वास ऐसे ही डगमगाता रहेगा।