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संपादकीय: क्या राम मंदिर का चढ़ावा सत्ता के गलियारों में सुरक्षित है? या ‘सत्ता के संरक्षण में भ्रष्टाचार’

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• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


अयोध्या का राम मंदिर—यह नाम केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का वह सर्वोच्च शिखर है, जिसे दशकों के संघर्ष के बाद खड़ा किया गया। लेकिन, आज इसी मंदिर के प्रांगण से जब ‘चढ़ावे’ और ‘दान’ की चोरी की खबरें आ रही हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है: क्या हम उस लक्ष्य तक पहुँच गए, जिसका सपना राम भक्तों ने देखा था? या फिर, हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ धर्म की आड़ में सत्ता का ‘अहंकार’ न्याय की हर आवाज को दबा रहा है?

एजेंसी कहाँ है?

आम जनता के जेहन में एक बड़ा सवाल तैर रहा है—आखिर ‘ईडी’ (ED) और ‘सीबीआई’ (CBI) की फाइलों में राम मंदिर का वह चढ़ावा क्यों नहीं है जो गायब हो गया? देश में छोटी से छोटी घटनाओं पर तत्परता दिखाने वाली केंद्रीय एजेंसियां इस मामले पर इतनी मौन क्यों हैं? क्या इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि जांच की लकीरें सत्ता के गलियारों तक न पहुँचें, इसलिए उन्हें पहले ही ‘फ्रीज’ कर दिया गया है? जब चोर स्वयं सत्ताधारी दल या उसके अनुषांगिक संगठनों (RSS/BJP) से जुड़े हों, तो जांच का ‘बुलडोजर’ क्यों नहीं चलता?

भय और सत्ता का अहंकार

आज की राजनीति में एक खतरनाक चलन विकसित हुआ है। नेताओं को अब जनता के गुस्से या चुनाव की फिक्र नहीं है। उनका गणित साफ है—”चाहे चुनाव कोई भी जीते, आज नहीं तो कल, ईडी और सीबीआई के डर या प्रलोभन से उसे हमारे पाले में ही आना है।” यह धारणा लोकतंत्र की आत्मा के लिए घातक है। जब राजनेताओं को यह यकीन हो जाए कि सत्ता का कोई विकल्प नहीं है, तो वे जनता को अपनी जागीर समझने लगते हैं। इसी अहंकार का परिणाम है कि राम मंदिर जैसे पावन विषय पर हो रही धांधली को भी ‘मामूली’ बताकर दबाने की कोशिश की जा रही है।

आस्था के साथ खिलवाड़: एक ‘कलंक’

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि ‘राम भक्तों की अग्निपरीक्षा न ली जाए’, एक गंभीर संकेत है। लेकिन सवाल यह है कि अग्निपरीक्षा किसकी? उन राम भक्तों की जो अपनी मेहनत की कमाई मंदिर में दान करते हैं, या उनकी जो मंदिर के नाम पर मलाई काट रहे हैं? राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि एक ‘कलंक’ है जो आने वाली पीढ़ियों तक पीछा करेगा। अगर समय रहते इसमें निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो इतिहास इसे ‘आस्था की लूट’ के रूप में दर्ज करेगा।

जनता की याददाश्त और लोकतंत्र

सत्ता में बैठे लोग शायद इस भ्रम में हैं कि जनता की याददाश्त कम होती है। वे भूल रहे हैं कि राम मंदिर की बात जब भी होगी, चढ़ावे की यह चोरी हर बार गूँजेगी। यह कोई सामान्य घोटाला नहीं है जिसे कुछ सालों में भुला दिया जाए। यह विश्वास का वह संकट है जो सरकार की नींव को हिलाने की क्षमता रखता है।

निष्कर्ष

समय आ गया है कि जनता यह समझे—लोकतंत्र तब तक जीवित है जब तक आप सवाल पूछना बंद न करें। राम मंदिर के नाम पर राजनीति करने वालों को यह याद दिलाना होगा कि राम काज में बाधा डालने वाले और मंदिर के धन पर हाथ साफ करने वाले, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, जनता की नजरों में अपराधी हैं। निष्पक्ष जांच और सख्त सजा ही वह एकमात्र रास्ता है जिससे यह ‘कलंक’ मिटाया जा सकता है। अन्यथा, राम भक्त कभी माफ नहीं करेंगे।

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