Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
मुंबई: एक आईपीएस (IPS) अधिकारी बनने का सपना अक्सर ‘जनसेवा’ और ‘संविधान की रक्षा’ के जज्बे से शुरू होता है। लेकिन क्या मुंबई पुलिस के शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी अपनी इस शपथ को भूल चुके हैं? आज मुंबई की जनता यह पूछने पर मजबूर है कि क्या पुलिस कमिश्नर देवेन भारती (Deven Bharti) की प्राथमिकताएं अब जनता की सुरक्षा नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण और प्रमोशन बन गई हैं?
चुनिंदा कार्रवाई: जनता के लिए चुप्पी, सत्ता के लिए तत्परता
पुलिस की कार्यशैली में आज एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। आम नागरिक की लिखित शिकायतें हों या ट्विटर पर की गई अपील, उन पर कार्रवाई तब तक नदारद रहती है जब तक किसी प्रभावशाली राजनेता का दखल न हो। पुलिस की प्राथमिकताओं का अंतर देखिए—एक तरफ आम जनता की समस्याओं पर गहरी चुप्पी है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने में खाकी पूरी तरह तत्पर है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पुलिस द्वारा सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी (SDPI नेता) के खिलाफ जारी किया गया ‘तड़ीपार’ (Externment) का आदेश। पुलिस का आरोप था कि उन्होंने विरोध प्रदर्शनों के दौरान “अमित शाह मुर्दाबाद” और “भाजपा सरकार मुर्दाबाद” जैसे नारे लगाए थे। सवाल यह है कि यदि पुलिस का इतना ही बल जनता की सुरक्षा और महिला उत्पीड़न रोकने में लगाया जाता, तो शायद आज शहर की स्थिति बेहतर होती। क्या मुंबई पुलिस अब केवल सत्ता में बैठे नेताओं की निजी सेना बनकर काम कर रही है?
उदासीनता की हदें: मालवानी पुलिस और न्याय का इंतजार
‘संसद वाणी’ द्वारा पहले भी उजागर किए गए मामले इसकी गवाही देते हैं। मालवानी पुलिस की अधिकारी अमृता देशमुख के विरुद्ध एक एनसी (NC) फाइल करने में तीन महीने का समय लगना और उसके बाद पुलिस आयुक्त कार्यालय तक शिकायत पहुँचने के बावजूद एक साल तक कोई ठोस कार्रवाई न होना, पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। अधिकारी का ट्रांसफर हो गया, लेकिन अमृता देशमुख पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुआ। क्या पुलिस आयुक्त कार्यालय में आम आदमी की शिकायतें केवल कचरे के डिब्बे में जाने के लिए आती हैं?
जनता के सेवक या सत्ता के गुलाम?
पुलिस के स्तर में आती यह गिरावट बेहद चिंताजनक है। क्या अधिकारियों का काम केवल नेताओं की ‘चापलूसी’ कर प्रमोशन पाना रह गया है? यदि अधिकारी नेताओं का गुलाम बनने के बजाय संविधान और जनता के प्रति अपनी निष्ठा रखें, तो शायद आज मुंबई की सड़कों पर आम आदमी खुद को सुरक्षित महसूस करता।
यह कोई आरोप नहीं, कार्यशैली पर कड़ा सवाल है
यह रिपोर्ट किसी पर व्यक्तिगत हमला नहीं, बल्कि पुलिस प्रशासन की उस कार्यशैली पर कड़ा सवाल है, जो व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रही है। जनता जानना चाहती है—क्या खाकी का मान अब नेताओं की मुट्ठी में कैद है? पुलिस कमिश्नर देवेन भारती को अब आत्म-चिंतन करने की आवश्यकता है, क्योंकि जनता के विश्वास के बिना कोई भी प्रशासन लंबे समय तक नहीं टिक सकता।