Connect with us

आलेख

संपादकीय: लोकसेवा या रसूखदारों का पहरा? नौकरशाही के बदलते मिजाज पर बड़ा सवाल

Published

on

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


जब कोई युवा भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) या पुलिस सेवा (IPS) का हिस्सा बनने के लिए दिन-रात एक करता है, तो उसके आदर्श आसमान छू रहे होते हैं। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के साक्षात्कार में उनका सबसे रटा-रटाया और आदर्शवादी जवाब यही होता है—”मैं जनता की सेवा करना चाहता हूँ और समाज में हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहता हूँ।” लेकिन एक बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि पद, वर्दी और कुर्सी मिलते ही प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर यह बेतहाशा ‘अहंकार’ और आम जनता से दूरी बनाने की प्रवृत्ति कहाँ से आ जाती है?

जनता के लिए लंबी प्रतीक्षा, रसूखदारों के लिए तत्परता

आज के समय में यह सवाल हर आम नागरिक के जेहन में है कि क्या एक साधारण व्यक्ति अपनी किसी गंभीर परेशानी को लेकर सीधे किसी आला दर्जे के अधिकारी से आसानी से मिल सकता है? जवाब अक्सर निराशाजनक होता है। चुनाव जीतने के बाद जिस तरह कई राजनेता आम जनता की पहुँच से दूर हो जाते हैं और प्रोटोकॉल के आवरण में छिप जाते हैं, ठीक वही वीआईपी कल्चर (VIP Culture) आज की नौकरशाही ने भी अपना लिया है। शायद उन्हें लगता है कि अगर वे आम जनता से आसानी से मिलने लगे और उनकी फरियाद सीधे सुनने लगे, तो उनका रुतबा कम हो जाएगा।

लेकिन इसी सिक्के का दूसरा पहलू देखिए। जब किसी मलाईदार पोस्टिंग, मनचाहे तबादले या राजनीतिक रसूख का मामला आता है, तो यही प्रशासनिक तंत्र सारे नियम-कानूनों की व्याख्या अपने हिसाब से करने लगता है। तब जनहित के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और एकमात्र ध्येय सत्ता के गलियारों को संतुष्ट करना रह जाता है। आम जनता के बुनियादी मुद्दों को दरकिनार कर सिर्फ रसूखदारों को खुश रखने की यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बनती जा रही है।

न्यायालय का चाबुक और प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग

अगर किसी को इस व्यवस्थागत ढिलाई पर यकीन न हो, तो हाल ही में मुंबई पुलिसिंग व्यवस्था के एक मामले पर बंबई उच्च न्यायालय (Bombay High Court) की तल्ख टिप्पणियों को देख सकता है। मामला एक नागरिक द्वारा राजनीतिक विरोध स्वरूप नारेबाजी करने पर पुलिस प्रशासन द्वारा उसके खिलाफ सीधा ‘तड़ीपार’ (Externment) का गंभीर आदेश जारी करने से जुड़ा था।

इस मामले में बंबई उच्च न्यायालय ने एक बेहतरीन और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए न केवल उस तड़ीपार के आदेश को खारिज किया, बल्कि पुलिस तंत्र को कड़ी फटकार भी लगाई। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि लोकतंत्र में जनता को नीतियों पर असहमति जताने और विरोध करने का पूरा अधिकार है। आप नागरिकों की आवाज दबाने के लिए पुलिसिया शक्तियों का इस तरह मनमाना दुरुपयोग नहीं कर सकते। अदालत का यह चाबुक यह साबित करता है कि कई बार पुलिस व्यवस्था कानून-व्यवस्था संभालने के बजाय राजनीतिक दबाव के तहत काम करने लगती है।

आम आदमी की बेबसी और व्यवस्थागत सुधार की मांग

यह घटना एक गहरी और खौफनाक तस्वीर भी पेश करती है। सोचिए, देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कितने ही आम नागरिक होंगे जिन्हें प्रशासनिक अहंकार और राजनीतिक दबाव के कारण रोज प्रताड़ित होना पड़ता होगा। हर गरीब या मध्यम वर्गीय व्यक्ति के पास इतने संसाधन नहीं होते कि वह पुलिसिया ज्यादती के खिलाफ न्याय मांगने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सके। जो अदालतों तक नहीं पहुँच पाते, उनकी फरियाद तो इन्हीं दफ्तरों की फाइलों में दबकर दम तोड़ देती है।

सेवाभाव या केवल सत्ता की परिक्रमा?

यह एक बेहद गंभीर और विचारणीय विषय है कि जिन आईएएस और आईपीएस अधिकारियों का मूल दायित्व जनता की सेवा करना और भारतीय संविधान की रक्षा करना है, वे आज व्यवस्था के दबाव में जनहित को भूलते जा रहे हैं। जब तक देश का नौकरशाह अपनी वर्दी और पद का इस्तेमाल जनता की भलाई के बजाय रसूखदारों को खुश करने के लिए करता रहेगा, तब तक आम आदमी यूं ही न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर रहेगा।

उम्मीद की किरण: कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की मिसाल

हालांकि, इसी व्यवस्था में आज भी कुछ ऐसे जांबाज और संवेदनशील अधिकारी मौजूद हैं, जो इस वीआईपी कल्चर के बिल्कुल खिलाफ हैं। देश ने ऐसे कलेक्टर्स को भी देखा है जो बिना किसी तामझाम के, आम जनता के बीच जमीन पर बैठकर उनकी फरियाद सुनते हैं, और ऐसे पुलिस कप्तानों को भी देखा है जो आधी रात को भी एक साधारण नागरिक की शिकायत पर खुद एक्शन लेते हैं। जब तक ऐसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी इस सिस्टम का हिस्सा हैं, तब तक आम जनता का खाकी और न्याय प्रणाली पर विश्वास पूरी तरह डिगा नहीं है।


​वक्त आ गया है कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था अपनी मूल शपथ को याद करे—वे इस देश की जनता के सेवक हैं, किसी दल या रसूखदार की निजी सेना नहीं। कानून और संविधान से ऊपर कोई नहीं है, और नौकरशाही को अपनी यह जवाबदेही हर हाल में साबित करनी होगी।

Continue Reading

Copyright © 2026 Vashishtha Media House Pvt. Ltd.