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जंतर-मंतर पर युवाओं का फूटा गुस्सा: पीएम मोदी ने 3 बार दिया बयान, लेकिन राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर अब भी रहस्यमयी चुप्पी!

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नई दिल्ली: देश की राजधानी का जंतर-मंतर इस समय युवाओं के आक्रोश का केंद्र बना हुआ है। पेपर लीक और धांधलियों से परेशान युवाओं के बढ़ते जनसैलाब और विरोध-प्रदर्शनों ने आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बोलने पर तो मजबूर कर दिया। जंतर-मंतर के दबाव का ही असर था कि प्रधानमंत्री ने एक के बाद एक तीन वीडियो संदेश जारी कर स्थिति पर अपनी बात रखी।

लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम में जो बात सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली और गंभीर है, वह यह कि तीन-तीन बार कैमरे के सामने आने के बावजूद प्रधानमंत्री ने अयोध्या राम मंदिर में हुए चढ़ावे की चोरी और वित्तीय अनियमितताओं पर एक शब्द भी नहीं कहा।

बड़ा सवाल: जब प्रधानमंत्री जंतर-मंतर के दबाव में युवाओं के मुद्दे पर तीन बार बयान दे सकते हैं, तो करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े ‘राम मंदिर चढ़ावा चोरी’ के मामले पर वे एक बार भी बोलना क्यों ज़रूरी नहीं समझते? आखिर इस चुप्पी का राज क्या है?

क्रेडिट लेने में होड़, तो घपले पर मुंह मोड़ क्यों?

अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा के समय यह संदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी कि यह सब प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई और उनके संघर्षों का नतीजा है। दिन-तारीख तय करने से लेकर ट्रस्ट के गठन तक, हर जगह प्रधानमंत्री की सीधी भूमिका रही।

ऐसे में जब उसी मंदिर में करोड़ों रुपये के चढ़ावे की चोरी और हेरफेर का मामला सामने आता है, तो सवाल सीधा प्रधानमंत्री से ही पूछा जाएगा:

  • नियुक्तियों पर सवाल: मंदिर ट्रस्ट और प्रबंधन में उन्हीं लोगों को क्यों बार-बार जगह दी जाती है जो एक खास संगठन (RSS) से जुड़े हैं?
  • योग्यता का अकाल? क्या 140 करोड़ के देश में कोई ऐसा निष्पक्ष, पढ़ा-लिखा और धर्मपरायण व्यक्ति नहीं है जो बिना किसी विवाद के मंदिर की व्यवस्था पारदर्शी तरीके से संभाल सके?
  • जिम्मेदारी से भागना: जब सफलता का क्रेडिट आपका है, तो उसके प्रबंधन में हुए भ्रष्टाचार की नैतिक जिम्मेदारी किसकी होगी?

“हिंदू ही तो है, चोरी कर ली तो क्या हुआ?” — समाज का नैतिक पतन

इस पूरे विवाद में एक और बेहद चिंताजनक पहलू सामने आया है। मीडिया और सोशल मीडिया का एक हिस्सा इस चोरी को ढंकने के लिए बेहद कुतर्क दे रहा है। कहा जा रहा है कि “पैसा हिंदुओं का था, किसी हिंदू ने ही ले लिया तो क्या फर्क पड़ता है?”

यह सोच समाज के लिए एक ज़हर की तरह है:

  1. कुतर्क की इंतहा: अगर कल को कोई चोर किसी हिंदू के घर में डाका डाले और कोर्ट में खड़े होकर कहे कि ‘मैं हिंदू हूँ और जिसके घर चोरी की वह भी हिंदू है, इसलिए पुलिस मुझे न पकड़े’—तो क्या देश का कानून इसे मानेगा?
  2. आस्था के साथ खिलवाड़: प्रभु राम के नाम पर आए दान के पैसे की चोरी का बचाव करना, धर्म नहीं बल्कि धर्म की आड़ में अधर्म को बढ़ावा देना है।

मुख्यधारा मीडिया का सरेंडर और दबाए जाते सवाल

आज देश की जनता यह साफ देख रही है कि सीबीआई (CBI), ईडी (ED), और इनकम टैक्स (IT) जैसी केंद्रीय एजेंसियां सिर्फ राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ सक्रिय होती हैं। जब बात अपनों के भ्रष्टाचार या राम मंदिर जैसे संवेदनशील मुद्दों की आती है, तो जांच की रफ्तार थम जाती है।

गोदी मीडिया और मुख्यधारा के बड़े चैनल इस विषय को दबाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। वे नहीं चाहते कि राम मंदिर के प्रबंधन में फैली अव्यवस्था और चोरी पर कोई राष्ट्रीय बहस हो।

हमारा काम है सवाल पूछना — यह विषय दबेगा नहीं!

हो सकता है कि आज सत्ता के दबाव में या मीडिया की अनदेखी के कारण यह खबर उतनी न पढ़े या देखे जाने का ढोंग रचा जाए, लेकिन पत्रकारिता का धर्म यही है कि जब तक जवाब न मिले, सवाल ज़िंदा रहना चाहिए।

जंतर-मंतर पर युवाओं के आक्रोश ने साबित कर दिया है कि जनता जब ठान लेती है, तो सत्ताधीशों को बैकफुट पर आना ही पड़ता है। अब देखना यह है कि करोड़ों रामभक्तों की आस्था के साथ हुए इस छल और चढ़ावा चोरी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी चुप्पी कब तोड़ते हैं—या फिर ‘धर्म के नाम पर सब माफ़ है’ का यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा?

सवालों का सिलसिला थमेगा नहीं, वशिष्ठवाणी हर उस मुद्दे पर सवाल उठाती रहेगी जिसे दबाने की कोशिश की जाएगी।

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