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लीह, लद्दाख: 29 सितंबर 2025 को, कारगिल युद्ध के एक पूर्व सैनिक त्सेवांग थारचिन (46) के अंतिम संस्कार के दौरान लद्दाख के लीह में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। थारचिन, जो लद्दाख स्काउट्स में हवलदार के रूप में 1996-2017 तक सेवा दे चुके थे, 24 सितंबर को पुलिस फायरिंग में मारे गए थे, जब वे लद्दाख के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी मौत के बाद क्षेत्र में तनाव चरम पर है।
घटना का विवरण:
फोटो में, एक फूलों से सजी गाड़ी में थारचिन का शव ले जाया जा रहा है, जिसमें भारतीय और तिब्बती झंडे लहराते हुए लोग शामिल हैं। प्रदर्शनकारियों और दुखी परिवार के बीच भारी संख्या में हथियारबंद पुलिसकर्मी तैनात हैं। 24 सितंबर को हुई हिंसा में थारचिन समेत चार लोगों की मौत हुई, जिसमें तीन युवा प्रदर्शनकारी भी शामिल हैं, और 80 से अधिक लोग घायल हुए। इसके बाद लीह में कर्फ्यू लगा दिया गया, इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, और प्रमुख कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया गया।
प्रदर्शन का कारण:
2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद से लद्दाख में पूर्ण राज्य का दर्जा और आदिवासी अधिकारों (छठी अनुसूची) की मांग जोर पकड़ रही है। स्थानीय संगठन लीह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। 15 दिनों तक भूख हड़ताल करने वाले वांगचुक ने हिंसा के बाद अपना अनशन समाप्त कर दिया, लेकिन सरकार के साथ बातचीत विफल रही।
जनता की प्रतिक्रिया:
सोशल मीडिया पर लोग इस घटना से आक्रोशित हैं। कई यूजर्स ने भारत सरकार पर सवाल उठाए, जिसमें एक ने लिखा, “पाकिस्तान उसे नहीं मार सका, लेकिन हमारे ही सैनिकों ने एक कारगिल नायक को मार डाला।” अन्य ने राष्ट्रीय मीडिया पर आरोप लगाया कि इस खबर को दबाया जा रहा है, जबकि कुछ ने न्यायिक जांच की मांग की। एक यूजर ने इसे “लोकतंत्र की मृत्यु” करार दिया।
अंतरराष्ट्रीय समाचार स्रोतों और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट्स के अनुसार, युवाओं में सरकार के प्रति भरोसा खत्म हो रहा है। थारचिन के पिता, जो खुद कारगिल युद्ध के वयोवृद्ध हैं, ने इस घटना को दुखद बताया। सरकार ने वांगचुक की संस्था का लाइसेंस रद्द कर दिया है, और 6 अक्टूबर को अगली वार्ता निर्धारित है, लेकिन तनाव बरकरार है।
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