Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
नई दिल्ली: भारतीय राजनीति के आधुनिक इतिहास में एक बेहद दिलचस्प और हैरान कर देने वाला ‘चमत्कार’ लगातार देखने को मिल रहा है। एक तरफ जनता महंगाई, बेरोजगारी और जमीनी स्तर के प्रशासनिक भ्रष्टाचार से जूझ रही है, तो दूसरी तरफ चुनावी नतीजों के बक्से खुलते ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक के बाद एक राज्य जीतती चली जाती है। विपक्षी दल और आलोचक चाहे मंचों से कितना भी चिल्ला लें कि ‘जमीन पर कोई काम नहीं हुआ’ या ‘वादे पूरे नहीं किए गए’, लेकिन देश की जनता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर आंख मूंदकर लगातार तीसरी बार उन्हें देश की सत्ता सौंप देती है।
जब लोकप्रियता का यह आलम हो, जब बिना किसी पारंपरिक रिपोर्ट कार्ड के भी जीत की गारंटी हो, तब ‘संसद वाणी’ सत्ता के शीर्ष से एक बेहद सीधा और कड़ा सवाल पूछने का साहस कर रहा है—“आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि पिछले १५ वर्षों में आपने एक भी खुली, आमने-सामने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की?”
अजेय और अटूट जनसमर्थन, फिर संवाद से यह ‘परहेज’ क्यों?
लोकतंत्र में नेताओं को अक्सर दो ही चीजों से डर लगता है—चुनाव हारने का डर या जनता की नाराजगी का खौफ। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी जी के मामले में ये दोनों ही बातें बेमानी साबित हो चुकी हैं। आप देश के सबसे ताकतवर और लोकप्रिय नेता हैं, वैश्विक मंचों पर आपकी तूती बोलती है, और आपकी रैलियों में उमड़ने वाली लाखों की भीड़ आपके एक इशारे पर मंत्रमुग्ध हो जाती है।
ऐसे में यह सवाल किसी पहेली से कम नहीं है कि जो नेता विपक्ष के बड़े से बड़े चक्रव्यूह को मिनटों में ध्वस्त कर देता हो, वह दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठे पत्रकारों के चंद तीखे सवालों का सामना करने से क्यों कतराता है? जब जनता का प्रचंड सर्टिफिकेट आपकी जेब में है, तो देश के मीडिया के सामने आकर बैठने में यह संकोच कैसा?
कटाक्ष: जब सवाल भी ‘मनमुताबिक’ होने की उम्मीद हो, तब भी दूरी क्यों?
चर्चा तो इस बात की भी है कि आज के दौर में मुख्यधारा (Mainstream) मीडिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा खुद सरकार की नीतियों के कसीदे पढ़ने में व्यस्त रहता है। अगर आज एक खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई भी जाए, तो इस बात की पूरी संभावना है कि पूछे जाने वाले सवाल बेहद अनुकूल, मीठे और विकास कार्यों पर ही केंद्रित होंगे।
जब मीडिया के तीखेपन का दांत पहले ही काफी हद तक टूट चुका है, तब भी प्रेस कॉन्फ्रेंस से यह दूरी क्या यह दर्शाती है कि सत्ता के शीर्ष ने अब यह मान लिया है कि मीडिया और उसके सवाल-जवाब का लोकतंत्र में कोई खास मतलब नहीं रह गया है? क्या ‘मन की बात’ जैसे एकतरफा संवाद माध्यमों ने लोकतंत्र की उस पारंपरिक व्यवस्था को रिप्लेस कर दिया है जहां रक्षक और सवाल पूछने वाले आमने-सामने बैठते थे?
निष्कर्ष: एक मजबूत लोकतंत्र को ‘एकतरफा संवाद’ मंजूर नहीं
चुनावी जीत आपको नीतियां बनाने का अधिकार देती है, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा ‘जवाबदेही’ और ‘स्वस्थ बहस’ में ही जीवित रहती है। देश का एक आम नागरिक, जो स्थानीय स्तर पर आरटीओ (RTO) के भ्रष्टाचार, ट्रैफिक की विसंगतियों और प्रशासनिक तानाशाही से त्रस्त है, वह यह उम्मीद करता है कि उसका चुना हुआ जनप्रनिधि मीडिया के कैमरों के सामने आकर सीधे और निडर होकर जनता के सवालों का सामना करे।
‘संसद वाणी’ बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के, चौथे स्तंभ की मर्यादा को निभाते हुए यह कड़ा आग्रह करता है। माननीय प्रधानमंत्री जी, देश आपकी राजनीतिक क्षमता का लोहा मान चुका है। अब वक्त आ गया है कि आप एक खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए इस अघोषित गतिरोध को तोड़ें और दुनिया को दिखाएं कि एक मजबूत प्रधानमंत्री सिर्फ रैलियों में बोलना नहीं जानता, बल्कि लोकतंत्र के सबसे तीखे और कड़े सवालों को भी मुस्कुराकर झेलने का माद्दा रखता है।