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अयोध्या। श्री राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर गहरा प्रहार बनकर उभरा है। इस घटना ने समाज के सामने एक ऐसा आईना रख दिया है, जहाँ ‘राम’ का नाम लेने वाले ही ‘राम’ के घर में सेंधमारी करते पाए गए। अब यह पूरा मामला आस्था के सम्मान से भटक कर सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक खींचतान का केंद्र बन गया है।
क्या धर्म और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं?
सवाल यह है कि जो लोग मंदिर निर्माण का श्रेय लेने में आगे थे, उन्हीं के कथित सहयोगियों पर चोरी का आरोप लगना पूरे हिंदू समाज के लिए शर्मिंदगी का विषय है। एक ओर सत्ताधारी दल इसे विपक्ष की साजिश बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी ओर जनता यह पूछने पर मजबूर है कि क्या ‘निष्पक्ष जांच’ के बजाय आरोपियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है?
आम जनमानस में यह आक्रोश है कि यदि दोषियों को बचाने की कोशिश की गई, तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर सत्ता की भूख का प्रदर्शन होगा।
जांच की सुस्त रफ्तार पर उठते सवाल
घटना की गंभीरता के बावजूद, अब तक पुलिस द्वारा किसी को भी रिमांड पर न लिया जाना कई सवाल खड़े करता है। जनता का तर्क है कि यदि सरकार वास्तव में चाहती है कि इस संवेदनशील विषय पर राजनीति न हो, तो जांच ऐसी होनी चाहिए थी जो नजीर बने। लेकिन मौजूदा स्थिति को देखकर ऐसा लग रहा है मानो दोषियों को खुली छूट दी गई है।
एक खतरनाक तर्क: “हिंदू का पैसा, हिंदू ने चुराया”
सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस चोरी को लेकर जो तर्क दिए जा रहे हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं। यदि ‘हिंदू का चढ़ावा’ हिंदू द्वारा चुराए जाने को जायज ठहराया जाएगा, तो कानून व्यवस्था का क्या होगा? यह एक ऐसा खतरनाक तर्क है जो अपराध को धर्म के चश्मे से देखने की विकृति पैदा करता है। यदि इसे आधार माना जाए, तो कल कोई भी अपराधी किसी के घर चोरी करके यह कह सकता है कि “पीड़ित और चोर दोनों एक ही धर्म के हैं, तो फिर शोर क्यों?”
क्या हम आस्था के रक्षक हैं या केवल सत्ता के पुजारी?
यह घटना यह साबित करती है कि कुछ राजनेताओं के लिए धर्म ‘आस्था का विषय’ नहीं, बल्कि ‘सत्ता की सीढ़ी’ मात्र है। जब तक धर्म को राजनीति से ऊपर रखकर दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हिंदू समाज का खड़ा किया गया यह कटघरा खाली नहीं होगा।
राम मंदिर में हुई यह चोरी केवल धन की चोरी नहीं है, यह उस भरोसे की चोरी है जो करोड़ों भक्तों ने अपनी मेहनत की कमाई अर्पित करते समय रखा था। अब वक्त आ गया है कि राजनीति बंद हो और न्याय हो, ताकि धर्म का मजाक उड़ाने वालों की बोलती बंद हो सके।