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क्या है जेनोफोबिक, बाइडेन के बयान पर मचा घमासान

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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है कि चीन, जापान और भारत जेनोफोबिक होने की वजह से आर्थिक तौर पर पिछड़े हैं. अब क्या ये टर्म, आइए समझ लेते हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी बाधा Xenophobic होना बताया है. उन्होंने कहा है कि भारत, चीन, रूस और जापान जैसे देश जिनोफोबिक होने की वजह से आर्थिक तौर पर नुकसान झेल रहे हैं. उनका कहना है कि ये देश प्रवासियों को स्वीकार नहीं करते हैं. उन्होंने कहा है कि इन देशों के ऐसे रुख की वजह से यहां गरीबी है और ये आर्थिक तौर पर पिछड़े देशों में शुमार हैं. 

जो बाइडेन ने रॉयटर्स के साथ हुए एक इंटरव्यू में कहा, ‘क्यों चीन आर्थिक तौर बोझिल हो है, क्यों जापान मुश्किलों में है. क्यों रूस और भारत की ये हालत है. वजह ये है कि ये जेनोफोबिक हैं. प्रवासी वे होते हैं जो हमें मजबूत बनाते हैं.’ जो बाइडेन के इस बयान पर घमासान मच गया है. लोगों का कहना है कि जो बाइडेन, भारत विरोधी बयान दे रहे हैं.

क्या है Xenophobia?

Xenophobia का मतलब डर से होता है. यह एक ग्रीक शब्द फोबिया को जोड़कर बना है. जोनोफोबिया का मतलब होता है कि अजनबियों या विदेशियों को देखकर डरने की भावना. ऐसी अवस्था, जब हमें विदेशियों से डर लगे. यह एक तरह का नस्लवाद है. जो बाइडेन ने इस शब्द का इस्तेमाल व्यापक संदर्भ में किया है. भारत, जापान, चीन और रूस जैसे देश, विदेशियों को लेकर बहुत उदार नहीं हैं. वे अपनी नीतियों में किसी को दखल नहीं देने देते, न ही निवेश को लेकर बड़ा मौका देते हैं. इसके पीछे की एक वजह यह भी है कि इन देशों का गुलाम इतिहास रहा है, जहां विदेशी व्यापार करने आए थे लेकिन कब्जा जमाकर चले गए. 

क्या सच में इन देशों में है गरीबी?

इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (IMF) ने अनुमान जताया है कि पूरी दुनिया आर्थिक मंदी से गुजरने वाली है. 2023 की तुलना में 2024 भारत पर भारी पड़ेगा. वे कह रहे हैं कि 0.9 प्रतिशत ग्रोथ जापान जैसे देश करेंगे, वहीं आर्थिक विकास की दर भारत में 6.8 प्रतिशत रहेगी.

क्यों इन देशों को विदेशियों पर है कम भरोसा?

जो बाइडेन, डोनाल्ड ट्रंप की प्रवासी विरोधी नीतियों के आलोचक रहे हैं. वे चाहते हैं कि आर्थिक नीतियां दुनिया के देश उदार करें, प्रवासियों को मौका दें. वे भारत, चीन और जापान जैसे देशों के साथ बेहतर संबंधों की वकालत करते हैं और कहते हैं कि इन देशों को अपनी प्रवासी नीतियों को सुधारना चाहिए.

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