नई दिल्ली — संसद के बजट सत्र के बीच एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने फैसला किया है कि जब तक उनके खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और फैसला नहीं होता, तब तक वे लोकसभा की कार्यवाही में शामिल नहीं होंगे और स्पीकर की कुर्सी पर बैठने से भी दूर रहेंगे।
यह निर्णय उन्होंने नैतिक आधार पर लिया है ताकि यह आरोप न लगे कि वे सदन की प्रक्रिया या निर्णय को प्रभावित कर रहे हैं। संसदीय नियमों के तहत ऐसा करना अनिवार्य नहीं है, लेकिन बिरला ने दोनों पक्षों की सलाह के बावजूद यह रुख अपनाया है।
विपक्ष का कदम और कारण
विपक्षी दलों ने मंगलवार (10 फरवरी 2026) को स्पीकर बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंपा। इस प्रस्ताव में आरोप लगाया गया है कि स्पीकर ने सदन की कार्यवाही के दौरान पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया और विपक्ष को बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दिया।
इसके अलावा विपक्ष ने 8 सांसदों को निलंबित करने, और नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोके जाने जैसे मुद्दों का जिक्र भी किया है जो गतिरोध का कारण बने।
प्रक्रिया और आगे की संभावना
विपक्ष के 118 से अधिक सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। संसदीय सूत्रों के अनुसार, यह प्रस्ताव अब लोकसभा सचिवालय में नियमों के अनुसार जांच के प्रक्रिया में है। किसी भी चर्चा या मतदान से पहले यह जरूरी है कि प्रस्ताव के लिए कम से कम 50 सांसदों का समर्थन हो।
सूत्रों के मुताबिक बजट सत्र के दूसरे चरण के दौरान 9 मार्च 2026 को इस प्रस्ताव पर चर्चा शुरू होने की संभावना है। यदि चर्चा होती है, तो उसके बाद वोटिंग की प्रक्रिया शुरू होगी, जिसमें अब तक संसद में बहुमत के आधार पर प्रस्ताव पास होने या न होने का अनुमान लगाया जा रहा है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
राजनीतिक हलकों में इस निर्णय को लेकर मतभेद हैं। कुछ पार्टी नेताओं का कहना है कि यह कदम संसदीय मर्यादा और निष्पक्षता के लिहाज से उचित है, जबकि अन्य इसे सियासी रणनीति का हिस्सा भी बता रहे हैं। विपक्ष और सत्ताधारी दलों के बीच इस मामले को लेकर तीखी बयानबाज़ी भी जारी है।