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राजनीति

माओवादी डेडलाइन 31 मार्च 2026: नक्सलवाद के खात्मे की राह पर भारत

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केंद्रीय गृह राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अमित शाह ने नक्सलवाद को भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती घोषित करते हुए 31 मार्च 2026 तक माओवादी विद्रोह को समाप्त करने की महत्वाकांक्षी रणनीति शुरू की थी। यह न केवल एक सैन्य अभियान था, बल्कि सरकार ने इसे विकास पहल, जनजातीय समाज को सशक्त बनाने और नक्सल–प्रभावित क्षेत्रों में बेहतर जमीनी निगरानी (सुरक्षा घेरा) के संयोजन के रूप में देखा।

सुरक्षा बलों ने झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में लगातार ऑपरेशन रेड़–हेमलेट, शांति नदी और विशेष रूप से बस्तर रेंज अभियान चलाए, जिनसे नक्सल घटनाओं वाले पुलिस स्टेशनों की संख्या 350 से घटकर 60 रह गई है। इसका मतलब है कि सक्रिय नक्सल “क्षेत्र” लगभग 80% तक संकुचित हो चुके हैं।


आज के विकास: 31 मार्च 2026

आज 31 मार्च 2026 को यह डेडलाइन औपचारिक रूप से समाप्त हो रही है, और खुफिया और सुरक्षा विभाग ने राष्ट्रीय स्तर पर अभियानों की समीक्षा शुरू कर दी है। छत्तीसगढ़ के बस्तर रेंज में सरेंडर की लहर बनी हुई है: हाल ही में 44 माओवादी कैडरों ने पूर्ण रूप से सरेंडर कर दिया, जिसमें 217 हथियार बरामद किए गए, जिनमें LMG, AK‑47 और INSAS जैसे स्वचालित असॉल्ट राइफलें शामिल हैं। इन माओवादियों में कई वरिष्ठ और 10–15 वर्षों से जंगल में गुमनाम रहे नेताओं का भी समावेश है, जो सरकारी विकास योजनाओं और नए रोज़गार के विकल्पों को देखकर वापसी की राह अपनाने पर राजी हुए हैं।

दूसरी ओर, झारखंड में अभी भी लगभग 44 हार्डकोर माओवादी कैडर सक्रिय रहने की रिपोर्ट आई है, जिन्हें सरकार ने “अंतिम समूह” के रूप में देखा है। इन क्षेत्रों में अभी भी गहन जंगली इलाकों में छोटे‑मोटे समूह टूटी‑फूटी स्थिति में रह रहे हैं, जिस कारण गृह मंत्रालय ने डेडलाइन को औपचारिक रूप से बढ़ाने की संभावना पर विचार करने की बात कही है, ताकि बाकी बचे माओवादियों को वैधना और विकास की राह पर लाने का प्रयास जारी रह सके।


राज्यवार स्थिति और आगे की रणनीति

  • छत्तीसगढ़: बस्तर, सुकमा और बीजापुर जैसे क्षेत्रों में नक्सल घटनाओं की संख्या पिछले 5 वर्षों में 60–70% तक गिर चुकी है। सरकार ने यहां विशेष रूप से जनजातीय युवाओं के लिए कौशल विकास केंद्र, रोज़गार मेले और ग्राम निर्माण योजनाएं चलाई हैं, जिससे माओवादी भर्ती की पुरानी “जमीन” धीरे‑धीरे सूख रही है।
  • झारखंड: गढ़वा, पाकुड़, दुमका और सहरसा जैसे जिलों में अभी भी छोटे झुंड दिखाई देते हैं, लेकिन अधिकांश रोज़मर्रा की घटनाएं छोटे उकसावे या व्यक्तिगत विवादों के दायरे में सीमित हैं, बड़े पैमाने पर विद्रोह की स्थिति नहीं बची।
  • ओडिशा, आंध्र और तेलंगाना: यहां नक्सल सक्रियता अब मुख्य रूप से सीमा‑संवेदनशील जिलों में ही रह गई है, जहां डेल्टा चोर रास्तों और वन मार्गों के ज़रिए बाहरी कैडरों के आने की संभावना बनी हुई है; इसलिए सीमा पार निगरानी और यातायात नियंत्रण अभियान भी जारी हैं।

आगे की रणनीति में सरकार “सेना–पुलिस–विकास” त्रिवेणी मॉडल को प्रमुखता दे रही है: जहां एक ओर सुरक्षा बल अरेरेस्ट और सरेंडर अभियान चलाएंगे, वहीं विकास विभाग शिक्षा, सड़क और बिजली के लिंकेज के माध्यम से नक्सल‑प्रभावित क्षेत्रों को सामान्य ज़िंदगी से जोड़ेंगे।

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