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मुम्बई

क्या कुर्सी मिलते ही बदल जाती है लोक सेवकों की प्राथमिकताएं? बीएमसी कमिश्नर की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल

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सवालों के घेरे में प्रशासनिक जवाबदेही: लीगल नोटिस के बाद भी बीएमसी कमिश्नर कार्यालय क्यों है मौन?

विशेष खोजी ब्यूरो, मुंबई (संसद वाणी):
एक आईएएस (IAS) अधिकारी का पद समाज सेवा, निष्पक्षता और आम आदमी की बुनियादी समस्याओं को हल करने की संवैधानिक शपथ से बंधा होता है। लेकिन क्या देश की सबसे अमीर महानगरपालिका (BMC) के शीर्ष पदों पर बैठते ही यह जवाबदेही प्रशासनिक फाइलों में दबकर रह जाती है? यह तीखा सवाल आज मुंबई की प्रबुद्ध जनता और नागरिक संगठन पूछने पर मजबूर हैं, और इसके केंद्र में हैं बीएमसी की वर्तमान आयुक्त अश्विनी भिड़े (Ashwini Bhide)।

हाई कोर्ट के आदेशों की धज्जियां: फुटपाथ से सड़क तक कब्ज़ा, कमिश्नर मौन

महानगर में आगामी त्योहारों की आड़ में फुटपाथों और मुख्य सड़कों पर हो रहे अवैध कब्जों का मुद्दा लगातार गंभीर होता जा रहा है। स्थिति यह हो चुकी है कि फुटपाथों पर पूरी तरह कब्जे के बाद अब यह अवैध अतिक्रमण मुख्य सड़कों तक पहुंच चुका है, जिससे पैदल चलने वाले राहगीरों के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर गाड़ियों के बीच से गुजरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

गौरतलब है कि माननीय बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने अपने ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों में साफ कहा था कि किसी भी धार्मिक या सामाजिक आयोजन के लिए मंडप इस तरह नहीं बनाए जा सकते जिससे आम जनता का रास्ता पूरी तरह ब्लॉक हो जाए। लेकिन मुंबई की सड़कों पर इस आदेश की खुलेआम धज्जियां उड़ती दिख रही हैं। इन अवैध मंडपों पर स्थानीय नगरसेवकों और राजनेताओं के चमचमाते बैनर और होर्डिंग्स इस कड़वी हकीकत को बयां करते हैं कि यह पूरा खेल ऊंचे रसूख और राजनीतिक संरक्षण के साए में चल रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या बीएमसी कमिश्नर अश्विनी भिड़े को मुंबई की सड़कों पर कानून का यह खुला उल्लंघन दिखाई नहीं दे रहा है?

लीगल नोटिस के बाद भी चुप्पी: जनसेवक का दायित्व या प्रशासनिक उदासीनता?

इस व्यवस्थागत ढिलाई और जनता की जान से हो रहे खिलवाड़ को लेकर ‘वाशिष्ठ मीडिया हाउस’ के संस्थापक अभिषेक अनिल वाशिष्ठ ने बकायदा बीएमसी कमिश्नर अश्विनी भिड़े को एक लीगल नोटिस भेजकर इस पर तत्काल कार्रवाई की मांग की थी और जवाब मांगा था। लेकिन बेहद आश्चर्य और चिंता का विषय है कि एक जिम्मेदार मीडिया हाउस द्वारा कानून के दायरे में उठाए गए इन वैध सवालों पर कमिश्नर कार्यालय ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है।

अतिक्रमण हटाने के लिए बीएमसी के पास भारी-भरकम बजट, विशेष दस्ता और असीमित कानूनी शक्तियां हैं। इसके बावजूद कमिश्नर अश्विनी भिड़े के नेतृत्व में प्रशासन का यह मौन जनता के मन में कई गंभीर सवाल पैदा करता है:

यदि बीएमसी कमिश्नर का मूल कर्तव्य जनता और कानून के प्रति जवाबदेह होना है, तो इतने बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध अतिक्रमण और लीगल नोटिस पर चुप्पी क्यों साधी जा रही है?

  • क्या देश की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा से आने वाले अधिकारी सिर्फ राजनीतिक आकाओं और रसूखदारों के दबाव में ही काम करेंगे, या आम जनता के प्रति भी उनकी कोई जिम्मेदारी बची है?

यह व्यक्तिगत हमला नहीं, पद की जवाबदेही पर सीधा सवाल है

यह विश्लेषण बीएमसी कमिश्नर पर कोई व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं है, बल्कि मुंबई महानगरपालिका अधिनियम (BMC Act) और माननीय अदालत के आदेशों के तहत उनके पद और कार्यशैली पर किया गया एक निष्पक्ष और तीखा प्रहार है। लोकतंत्र में यदि प्रेस शीर्ष अधिकारियों से उनकी विफलता पर सीधे सवाल नहीं पूछेगा, तो प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह निरंकुश हो जाएगा।

मुंबई की जनता को अब खोखले आश्वासनों या फाइलों की खानापूर्ति की नहीं, बल्कि बीएमसी कमिश्नर अश्विनी भिड़े से धरातल पर ठोस कार्रवाई और एक स्पष्ट, पारदर्शी जवाब की अपेक्षा है।

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