कर्नाटक कांग्रेस की सियासत इस समय एक हाई-वोल्टेज थ्रिलर का रूप ले चुकी है, जिसका क्लाइमेक्स अब दिल्ली की ‘शक्ति गलियों’ में खेला जा रहा है। एक तरफ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया हैं, जो अपनी कुर्सी की अवधि पूरी करने का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार का खेमा है, जिसने कथित ‘ढाई-ढाई साल के फार्मूले’ को याद दिलाते हुए ‘शक्ति हस्तांतरण’ का बिगुल फूंक दिया है।
ढाई साल का करार: क्या जुबान दी गई थी?
कांग्रेस सरकार ने हाल ही में अपने पांच साल के कार्यकाल का आधा सफर पूरा किया है। और ठीक इसी पड़ाव पर, उस अनौपचारिक करार की गूँज तेज हो गई है, जिसके तहत दोनों दिग्गजों में से हरेक को ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनना था।
- डीकेएस (DKS) खेमा: शिवकुमार के वफादार विधायक और मंत्री—जिन्हें कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार “बागी जत्था” कहा जा रहा है—ताबड़तोड़ दिल्ली का दौरा कर रहे हैं। उनका मिशन साफ है: आलाकमान पर इतना दबाव बनाना कि ‘वादे’ का सम्मान किया जाए। खबरें हैं कि डीकेएस समर्थक 50 से अधिक विधायकों के हस्ताक्षर जुटाने का दावा भी कर रहे हैं, जो एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है।
- सिद्धारमैया खेमा: वहीं, अनुभवी सिद्धारमैया, जो राज्य के सबसे बड़े जनाधार वाले नेताओं में से एक हैं, इन अटकलों को सिरे से खारिज कर रहे हैं। उन्होंने दो टूक कह दिया है कि वह अगला बजट भी पेश करेंगे (जो मार्च 2026 में होना है), यानी कुर्सी छोड़ने का कोई इरादा नहीं है। उनके समर्थकों का तर्क है कि ऐसा कोई रोटेशनल फॉर्मूला था ही नहीं, यह सिर्फ मीडिया की उपज है।
सीएम की दौड़ में तीसरी एंट्री
इस दो ध्रुवीय संघर्ष में एक नया ट्विस्ट तब आया जब वरिष्ठ दलित नेता और गृह मंत्री जी. परमेश्वर ने भी ताल ठोक दी। उन्होंने कहा कि वह भी हमेशा से सीएम की दौड़ में रहे हैं। इस बयान ने, सिद्धारमैया के करीबी दलित मंत्रियों की बैठकों के साथ मिलकर, जातीय समीकरणों को भी राजनीतिक अखाड़े में खींच लिया है। सिद्धारमैया खेमा भी कथित तौर पर यह पैंतरा खेल रहा है कि अगर नेतृत्व परिवर्तन होता है, तो अगला सीएम डीके शिवकुमार नहीं, बल्कि एक दलित मुख्यमंत्री होना चाहिए।
हाईकमान की खामोशी और भाजपा का वार
दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और अन्य शीर्ष नेताओं के साथ बैठकों का दौर जारी है। हालांकि, आलाकमान ने अभी तक कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। सीएम सिद्धारमैया ने खरगे से मुलाकात के बाद कहा है कि हाईकमान का फैसला सबको मानना होगा।
उधर, विपक्ष इस ड्रामे को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। भाजपा ने सीधे आरोप लगाया है कि सीएम पद बदलने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त हो रही है, जिसमें 50 करोड़ रुपये, फ्लैट और कारें देने का लालच दिया जा रहा है।
आगे क्या?
कर्नाटक का सियासी मंच पूरी तरह से सज चुका है। सिद्धारमैया अपने अनुभव और जनाधार के बल पर कुर्सी बचाने के लिए दृढ़ हैं, जबकि डी.के. शिवकुमार अपनी सांगठनिक शक्ति और कथित ‘वादे’ के आधार पर शीर्ष पद हथियाने को आतुर हैं।
सवाल यह है कि क्या कांग्रेस हाईकमान ‘परिवार के भीतर शांति’ बनाए रखने के लिए ढाई-ढाई साल के फार्मूले पर मुहर लगाएगा, या फिर सिद्धारमैया को पूर्ण कार्यकाल देकर फिलहाल इस विवाद को टाल देगा? कर्नाटक का राजनीतिक तापमान बता रहा है कि यह सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि कांग्रेस के लिए अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है।

