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मुंबई (विशेष डेस्क): “जब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी निष्पक्षता खो देता है, तो पूरा तंत्र पंगु हो जाता है।” यह आज भारतीय मुख्यधारा (Mainstream) मीडिया की कार्यशैली पर लगने वाला सबसे गंभीर आरोप है। हालांकि इस बात का कोई ऑन-कैमरा सबूत नहीं है कि देश का ९०% से अधिक मीडिया किसी एक रिमोट कंट्रोल या इशारे पर काम कर रहा है, लेकिन टीवी चैनलों की रोज़ाना की प्राइम-टाइम डिबेट्स, हेडलाइंस और खबरों की प्राथमिकताएं साफ गवाही देती हैं कि मीडिया अब सरकार से जवाब मांगने के बजाय विपक्ष को ही कटघरे में खड़ा करने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा रहा है।
२०१४ के बाद से देश की राजनीतिक और मीडिया संस्कृति में जो बदलाव आया है, उसने पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।
कच्छ का ऐतिहासिक उदाहरण: तब की जांबाज पत्रकारिता बनाम आज का दौर
मीडिया के इस बदलते चरित्र और वैचारिक पतन को समझने के लिए हमें कच्छ (Kutch) का उदाहरण देखना होगा। वर्ष २००१ के विनाशकारी कच्छ भूकंप के बाद जब गुजरात में राहत कार्यों, पुनर्निर्माण और प्रशासनिक ढिलाई की कमियां सामने आई थीं, तब तत्कालीन मीडिया ने बिना किसी दबाव के सरकार से बेहद कड़े और तीखे सवाल पूछे थे। कच्छ के पीड़ितों की बदहाली और जमीनी स्तर के भ्रष्टाचार को मीडिया ने बिना किसी खौफ के देश के सामने रखा था और प्रशासन को जवाबदेह बनाया था।
लेकिन आज की हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। आज देश के किसी भी हिस्से में प्रशासनिक लापरवाही हो, बेरोजगारी या महंगाई का मुद्दा हो, या फिर कंदिवली जैसी स्थानीय जगहों पर ट्रैफिक विभाग और आरटीओ (RTO) की मिलीभगत से जनता की जान से खिलवाड़ हो रहा हो—मुख्यधारा का मीडिया इन मुद्दों पर ग्राउंड रिपोर्टिंग करने के बजाय, शाम ५ बजे स्टूडियो के बंद कमरों में बैठकर विपक्ष की कमियां ढूंढने की स्क्रिप्ट तैयार करता है।
वैश्विक स्तर पर प्रमाण: प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत का गिरता ग्राफ
यह केवल जनता का एक अवांछित आरोप नहीं है, बल्कि इसके अंतरराष्ट्रीय और सांख्यिकीय प्रमाण भी मौजूद हैं। वैश्विक संस्था ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (Reporters Without Borders) द्वारा जारी होने वाले प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक) में भारत की रैंकिंग का लगातार गिरना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि भारतीय मीडिया अपनी आजादी और निष्पक्षता खोता जा रहा है। सत्ता के सामने इस तरह का आत्मसमर्पण वैश्विक स्तर पर देश की छवि को प्रभावित कर रहा है।
टीआरपी का लालच या सरकारी एजेंसियों का अघोषित डर?
आखिर मीडिया अपने मूल कर्तव्य (सत्ता से सवाल पूछना और जनता की आवाज बनना) को छोड़कर इस राह पर क्यों चला गया? इसके पीछे दो बड़े और ठोस कारण साफ नजर आते हैं:
१. कॉरपोरेट और सरकारी विज्ञापनों का दबाव: आज के बड़े मीडिया घराने पूरी तरह से सरकारी विज्ञापनों के करोड़ों रुपये के बजट पर टिके हैं। व्यवस्था के खिलाफ एक भी सच्ची खबर दिखाने का सीधा मतलब होता है—विज्ञापनों का बंद होना और चैनल का वित्तीय संकट में आ जाना।
२. एजेंसियों का अघोषित खौफ: जो भी स्वतंत्र पत्रकार या डिजिटल मीडिया संस्थान सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल उठाते हैं, उन्हें विभिन्न कानूनी पचड़ों और मुकदमों का सामना करना पड़ता है। इसी डर ने बड़े-बड़े मीडिया कप्तानों को ‘वॉचडॉग’ (जनता के प्रहरी) से हटाकर एक विशेष भूमिका में ला खड़ा किया है।
निष्कर्ष: ‘संसद वाणी’ जैसी स्वतंत्र पत्रकारिता ही आखिरी उम्मीद
अदालतों की लंबी तारीखों, कड़े नियमों और नेताओं की बेरुखी से त्रस्त आम जनता जब उम्मीद भरी नजरों से टीवी स्क्रीन को देखती है, तो उसे वहां सिर्फ राजनीतिक नूराकुश्ती का खेल दिखाई देता है। यही कारण है कि आज देश में बड़े चैनलों की विश्वसनीयता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।
ऐसे चुनौतीपूर्ण दौर में ‘संसद वाणी’ जैसे स्वतंत्र डिजिटल और प्रिंट माध्यमों की जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है, जो बिना किसी कॉरपोरेट दबाव या डर के, स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक व्यवस्था की आंखों में आंखें डालकर सच लिखने का साहस दिखा रहे हैं।