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उड़ीसा हाईकोर्ट ने सरोगेसी के जरिए मां बनने वाली महिलाओं को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट का कहना है कि मां बनने वाली महिला कर्मचारियों को वैसे ही मैटेरनिटी लीव एवं अन्य लाभ पाने का अधिकार है जो प्राकृतिक रूप से बच्चे को जन्म देने वाली या बच्चा गोद लेकर मां बनने वाली महिलाओं को प्राप्त है।
इस मुददे पर ओडिशा फाइमेंस सर्विस की महिला अधिकारी सुप्रिया जेना की याचिका दर्ज करवाई थी। उन्होंने 2022 में इसे लेकर याचिका दर्ज करवाई थी। उन्होंने कहा था कि वे सरोगेसी के ज़रिए मां बनी थी, जिसके बाद उन्होंने 180 दिन की मैटरनिटी लीव मांगने पर देने से मना कर दिया। इसलिए उन्होंने सरकार के विरूद्ध हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
इस पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जिस तरह प्राकृतिक रूप से मां बनने वाली सरकारी कर्मियों को 180 दिन की छुट्टी मिलती है, उसी तरह 1 साल उम्र तक के बच्चे को गोद लेने वाली सरकारी कर्मियों को भी उसकी (बच्चे की) देखभाल के लिए 180 दिन की छुट्टी मिलती है। हालांकि इस तरह की लीव के लिए कोई प्रावधान नही है।
हाई कोर्ट ने कहा, “यदि सरकार गोद लेकर मां बनने वाली महिला को मैटेरनिटी लीव दे सकती है तो उस मां को मैटेरनिटी लीव से वंचित करना गलत होगा जिसे सरोगेसी देने वाली महिला के गर्भ में संतान पाने को इच्छुक दंपति के अंडाणु या शुक्राणु से तैयार भ्रूण के अधिरोपण के बाद इस प्रक्रिया से बच्चा मिला हो।”
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