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₹22,000 करोड़ का दाँव: भारत ने प्रतिबंधों से पहले रूस से क्यों भरा तेल का टैंक?

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अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया में, कुछ फैसले पैसे से नहीं, बल्कि रणनीति से लिए जाते हैं। भारत के लिए, रूसी कच्चे तेल पर अक्टूबर में किया गया €2.5 बिलियन (लगभग ₹22,170 करोड़) का यह भारी-भरकम खर्च सिर्फ एक व्यापारिक लेनदेन नहीं था—यह पश्चिमी प्रतिबंधों के तूफ़ान से ठीक पहले अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने की एक सोची-समझी चाल थी।

यह घटना अक्टूबर 2025 की है, जब अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने रूस की प्रमुख तेल कंपनियों, रोसनेफ्ट और लुकऑयल, पर नए और सख्त प्रतिबंध लागू करने की तैयारी कर ली थी।


दंभ और छूट का गणित (The Economics of Discount)

भारत के इस “खरीददारी उन्माद” के पीछे का कारण बहुत सीधा है: बड़ी छूट (Heavy Discount)

  • यूक्रेन युद्ध के कारण यूरोपीय बाज़ार से बाहर किए जाने के बाद, रूस को अपने तेल के लिए बड़े खरीदारों की तलाश थी।
  • भारत ने इस अवसर का फायदा उठाया, और पारंपरिक रूप से मध्य-पूर्वी तेल पर निर्भर रहने के बावजूद, रूसी तेल का आयात लगभग 1% से बढ़ाकर 40% तक कर दिया।
  • सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर में भारत ने चीन के बाद रूसी जीवाश्म ईंधन का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बने रहने के लिए इस रिकॉर्ड तोड़ खरीद को जारी रखा।

यह €2.5 बिलियन का निवेश यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया कि जैसे ही 22 अक्टूबर को अमेरिकी प्रतिबंध प्रभावी हों, भारत के पास अपनी रिफाइनरियों को चलाने के लिए पर्याप्त स्टॉक हो, और वह संभावित आपूर्ति व्यवधानों (Supply Disruptions) के जोखिम से बच सके।


🛡️ भारत का रुख: राष्ट्रीय हित सर्वोपरि

पश्चिमी देश लगातार भारत और चीन पर दबाव बना रहे हैं कि वे रूसी तेल की खरीद कम करें, यह तर्क देते हुए कि यह रूस को युद्ध के लिए वित्तीय मदद दे रहा है। लेकिन भारत का रुख हमेशा स्पष्ट रहा है:

“हमारा देश पहले।”

यह बड़ी खरीद दर्शाती है कि नई दिल्ली बाहरी दबाव के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती है। सस्ते रूसी तेल से न केवल भारत की विदेशी मुद्रा की बचत होती है, बल्कि यह घरेलू बाज़ार में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों को भी स्थिर रखने में मदद करता है। यह एक कूटनीतिक संतुलन बनाने की कला है, जहाँ भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) बनाए रखता है।

नए प्रतिबंधों के कारण कुछ निजी भारतीय रिफाइनरियों ने अस्थायी रूप से रूसी तेल का आयात रोक दिया है, लेकिन अक्टूबर की यह खरीद एक बफर के रूप में काम करेगी और सरकार को भविष्य के लिए नए आपूर्ति मार्ग और भुगतान तंत्र खोजने के लिए समय देगी।

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