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जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक, तीसरे कार्यकाल में घट गई लोकप्रियता; क्या 1991 के तर्ज पर इस बार बनेगी मोदी सरकार?

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Nehru To Modi Popularity Fell In Third Term: पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक, तीसरे कार्यकाल में उनकी लोकप्रियता में कमी आ ही गई. आइए, जानते हैं कि आखिर सरकार बनाने के बाद नरेंद्र मोदी किस मॉडल पर काम कर सकते हैं?

सरकार किसी भी पार्टी की हो, उस पार्टी का प्रधानमंत्री कितना भी सक्सेसफुल क्यों न हो, तीसरे कार्यकाल तक उनकी लोकप्रियता कम हो ही जाती है. अब तक ऐसा दो बार हुआ है. पहली बार पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ. दूसरी बार नरेंद्र मोदी के साथ. 

2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने तो वोटशेयर और सीट संख्या 2024 के मुकाबले कहीं बेहतर थी. 2014 में मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 282 सीटें जीतीं और वोट शेयर 31 फीसदी रहा. 5 साल बाद जब मोदी दूसरे कार्यकाल के लिए चुनावी मैदान में गए, तो भाजपा का प्रदर्शन और बेहतर हो गया. 2019 में भाजपा की सीटें भी बढ़ीं और वोट शेयर भी पहले के मुकाबले मजबूत हुआ. 2019 में भाजपा को 303 सीटें मिलीं और 37.60 फीसदी वोट शेयर मिले. 2024 में भाजपा का वोट शेयर 36.58 फीसदी है और भाजपा को 240 सीटें मिली हैं.

गुजरात में तीसरे कार्यकाल में भी कुछ ऐसा ही हुआ था

नरेंद्र मोदी जब गुजरात में थे, तब उनके पहले कार्यकाल यानी 2002 में भाजपा का वोट शेयर 49.85 फीसदी था और 127 सीटें मिलीं थीं. फिर 2007 में वोटशेयर और सीटें दोनों गिर गईं. 49.12 वोट शेयर के साथ भाजपा को 117 सीटें मिलीं. तीसरे कार्यकाल यानी 2012 में तो वोट शेयर और गिरकर 47.85 फीसदी तक पहुंच गया और सीटें भी 115 ही मिलीं. 

पंडित नेहरू के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था

पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. पंडित नेहरू के दूसरे कार्यकाल में उन्हें बेहतर वोट शेयर और अधिक सीटें मिलीं. लेकिन तीसरे कार्यकाल में वोट शेयर और सीटें दोनों घट गईं. 1951-52 के पहले चुनाव में नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस का वोट शेयर 44.99% था और कांग्रेस को 364 सीटें मिली थीं. 1957 के दूसरे चुनाव में नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस को 47.78% वोट शेयर मिला और 371 सीटें मिलीं.. 1962 के तीसरे चुनाव में वोट शेयर घटकर 44.72% पर पहुंच गया और सीटें 361 मिलीं. आंकड़ों को देखें तो उनके तीसरे कार्यकाल में सीटें पहले के मुकाबले कम हो गईं.

क्या 1991 के तर्ज पर इस बार बनेगी मोदी सरकार?

केंद्र सरकार के लिए जो आज स्थिति बनी थी. ऐसी ही स्थिति कुछ 1991 में भी थी. 1991 में कांग्रेस को 244 सीटें मिली थीं और कांग्रेस लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी थी. इस बार भाजपा को 240 सीटें मिली हैं. आज भाजपा भी देश की सबसे बड़ी पार्टी है. उस समय प्रधानमंत्री पद के लिए पीवी नरसिम्हा राव, महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और वित्त मंत्री रहे एनडी तिवारी का नाम चर्चा में था. केंद्र में गठबंधन सरकार बननी थी. लेकिन सवाल था कि प्रधानमंत्री पद कौन संभालेगा?

उस वक्त देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाया. कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए जनता दल के वीपी सिंह और सीपीआई (एम) के नंबूद्रीपाद का समर्थन लेना पड़ा. 5 साल के कार्यकाल के दौरान नरसिम्हा राव ने देश में कई आर्थिक सुधार किये. 

अब 2024 का नतीजा समझ लीजिए. नतीजों के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई भाजपा को अब सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों का समर्थन लेना होगा. 1991 में वीपी सिंह और नंबूद्रिपदे थे तो इस बार नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू हैं. इन दोनों पार्टियों के साथ भाजपा का गठबंधन है. बिहार में नीतीश कुमार की जेडीयू ने 12 सीटें और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी ने 16 सीटें जीतीं हैं. इस तरह दोनों को मिलाकर 28 सीटें हो जाती हैं. अगर ये दोनों भाजपा को समर्थन देते हैं तो केंद्र में अब की बार मोदी सरकार की जगह गठबंधन सरकार बनेगी.

सीटें कम होने के बावजूद पहले भी 3 बार बन चुकी है सरकार, कार्यकाल भी पूरा किया

भाजपा के पास नहीं, लेकिन NDA के पास बहुमत है. ऐसा नहीं है कि ये पहली बार है, जब देश की सबसे बड़ी पार्टी बहुमत के आंकड़ों से कुछ कदम पीछे रह गई है. एक उदाहरण तो हमने पीवी नरसिम्हा राव का देख ही लिया. इसके अलावा, दो बार ऐसी स्थिति सामने आई, जब सीटें कम होने के बावजूद सबसे बड़ी पार्टी ने केंद्र में सरकार बनाई. ये सरकार मनमोहन सिंह की थी. 2004 और 2009 में मनमोहन सिंह ने ऐसे ही केंद्र में सरकार बनाई थी.

2004 में केंद्र की तत्कालीन वाजपेयी सरकार को लोकसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था. तब कांग्रेस ने गठबंधन कर सरकार बनाई और देश की कमान डॉक्टर मनमोहन सिंह को सौंपी गई. 2004 में कांग्रेस को 145 सीटें मिली थीं. कांग्रेस का वोट शेयर 28.30% था, जबकि भाजपा को 138 सीटें मिली थीं और वोट शेयर 23.75% रहा था. आज जो समाजवादी पार्टी की स्थिति है, वैसी स्थिति सीपीआई (एम) लेफ्ट की 2004 में थी. तब सीपीआई (लेफ्ट) ने 43 सीटें जीती थी. उस वक्त कांग्रेस ने बीएसपी, एसपी, केरल कांग्रेस और लेफ्ट की मदद से 335 सीटों के साथ UPA सरकार बनाई और पांच साल का कार्यकाल पूरा किया.

2009 में जब लोकसभा चुनाव हुए, तब भी कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला. कांग्रेस ने 26.53% वोट शेयर के साथ 206 सीटें जीतीं. वहीं, भाजपा को 22.16% वोट शेयर के साथ 145 सीटें मिलीं. सीपीआई (एम) लेफ्ट ने 16 सीटें जीतीं. एक बार फिर देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई और बसपा, सपा, जनता दल (एस), राजद और अन्य छोटे दलों का समर्थन लिया. उस दौरान यूपीए-2 में 322 सीटों के साथ मनमोहन सिंह के हाथों में देश की कमान सौंपी गई. ये सरकार भी 5 साल तक चली.

क्या अब अटल बिहारी वाजपेयी के रास्ते चलेंगे नरेंद्र मोदी?

चुनाव नतीजों के बाद देर शाम नरेंद्र मोदी दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय पहुंचे. यहां उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए 6 बार NDA और 2 बार भाजपा का नाम लिया. उन्होंने कहा कि 1962 के बाद पहली बार कोई सरकार अपने दो कार्यकाल पूरे करने के बाद तीसरी बार सत्ता में लौटी है. तीसरा कार्यकाल बड़े फैसलों की नई इबारत लिखेगा और ये मोदी की गारंटी है. उन्होंने ये भी कहाक कि NDA भारत को तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए कड़ी मेहनत करेगा. NDA सरकार का जोर भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने पर होगा. NDA सरकार विकसित भारत के लक्ष्य के लिए कड़ी मेहनत करेगी. NDA गठबंधन को देश की जनता ने सेवा का मौका दिया है. मोदी के संबोधन के बाद ऐसा लगा कि वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी वाले NDA की राह पर चलने को पूरी तरह से तैयार हैं.

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