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स्पीकर के पद के लिए एनडीए में खींचातान चल रही है लेकिन लोकसभा स्पीकर का पद इतना अहम है कि भाजपा किसी भी कीमत पर इस पद को अपने सहयोगी दलों को नहीं देना चाहती.
रविवार को प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रिमंडल के शपथ लेने के साथ ही नई सरकार का गठन हो गया. पीएम मोदी समेत एनडीए के कुल 72 सांसदों ने मंत्री पद की शपथ ली. फिलहाल तो सब कुछ ठीक हो गया लेकिन एक सवाल जो सबके दिमाग में कौंध रहा है वो यह कि आखिर स्पीकर का पद किस पार्टी के हिस्से में मिलेगा?
इस तरह की खबर है लोकसभा स्पीकर के पद के लिए भाजपा और उसकी प्रमुख सहयोगी पार्टी टीडीपी और जेडीयू के बीच खींचातान चल रही है, लेकिन इस पद की अहमियत इतनी ज्यादा है कि भाजपा किसी भी कीमत पर स्पीकर के पद को अपने पास रखने की कोशिश कर रही है.
आइए जानते हैं कि यह पद इतना अहम क्यों है?
लोकसभा स्पीकर एक संवैधानिक पद है. स्पीकर की इजाजत के बगैर लोकसभा में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता.
लोकसभा स्पीकर का फैसला आखिरी फैसला होता है. संसद में इसकी भूमिका निर्णायक होती है.
बहुमत साबित करने के दौरान जब दल-बदल कानून लागू होता है तो उस समय लोकसभा स्पीकर की भूमिका बेहद अहम हो जाती है.
संसद को स्थगित करने और किसी भी सांसद को सस्पेंड तक करने का अधिकार स्पीकर के पास होता है.
इसके पास किसी भी सांसद की योग्यता और अयोग्यता पर फैसला लेने का भी अधिकार होता है.
संसद में कोई भी प्रस्ताव लाने और पारित करने के दौरान भी स्पीकर का फैसला निर्णायक होता है.
संसदीय समितियों के गठन का अधिकार भी स्पीकर के पास ही होता है.
अविश्वास प्रस्ताव को छोड़कर जितने भी प्रस्ताव सदन में आते हैं वो स्पीकर की अनुमति से पी पेश किये जाते हैं.
अगर किसी बिल या प्रस्ताव पर समान वोट पड़े हैं तो वह अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर उस प्रस्ताव को पास करा सकता है.
कैसे होता है लोकसभा स्पीकर का चुनाव
लोकसभा सदस्य में से ही किसी एक को स्पीकर चुना जाता है. साधारण बहुमत के आधार पर ही लोकसभा स्पीकर का चुनाव होता है. इसका कार्यकाल 5 साल का होता है.
क्या बलराम जाखड़ का टूटेगा रिकॉर्ड
मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में ओम बिड़ला स्पीकर थे. अगर वह इस बार भी लोकसभा स्पीकर चुने जाते हैं और सफलतापूर्वक अपना कार्यकाल पूरा कर लेते हैं तो बलराम जाखड़ का रिकॉर्ड टूट जाएगा. बलराम जाखड़ एकमात्र ऐसे स्पीकर हैं जो 2 बार चुने गए और उन्होंने अपने दोनों कार्यकाल पूरे किए.
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