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मुंबई: एक बार फिर मुंबई के फुटपाथों पर ‘धर्म के व्यापारियों’ का कब्जा है और बीएमसी प्रशासन मूकदर्शक बना बैठा है। हमने पहले भी नोटिस के जरिए प्रशासन को जगाने की कोशिश की, लेकिन ऐसा लगता है कि बीएमसी अधिकारियों के लिए कानून और जनहित केवल कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं।
आस्था के नाम पर सड़क और फुटपाथ की ‘नीलामी’?
‘संसद वाणी’ का स्पष्ट सवाल है—आखिर इन ‘धर्म के व्यापारियों’ को फुटपाथ पर मंडप सजाने की खुली छूट किसने दी? फुटपाथ पर कब्जा, फिर सड़क के आधे हिस्से तक मंडप का विस्तार, और इसके बाद रही-सही कसर अवैध पार्किंग पूरी कर देती है। जब फुटपाथ और सड़क दोनों ही इन कब्जों की भेंट चढ़ गए हैं, तो फिर आम आदमी, स्कूली बच्चे और बुजुर्ग कहाँ से गुजरें? क्या अब मुंबई की जनता को भी अपनी जान हथेली पर रखकर सड़क के बीच से गुजरने का नया ‘नियम’ बीएमसी ने बना दिया है?
अश्विनी भिड़े, क्या आपने जनसेवा की शपथ ली थी या ‘मलाई’ की?
अधिकारी बनने से पहले हर कोई समाज सुधार और निष्पक्ष कार्यप्रणाली की कसम खाता है। लेकिन कुर्सी पर बैठते ही यह कैसा अहंकार? ऐसा लगता है जैसे आप लोगों को यह बखूबी पढ़ाया जाता है कि कैसे जनता की तकलीफों को अनदेखा करना है और नेताओं के इशारे पर अपनी आंखें मूंद लेनी हैं। क्या बीएमसी कमिश्नर का पद इसलिए है कि आप जनता के अधिकारों का सौदा कर सकें?
क्या आप कानून से ऊपर हैं?
अश्विनी भिड़े जी, आप बीएमसी की मुखिया हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आप कानून से ऊपर हैं। जनता के साथ खिलवाड़ करने का यह सिलसिला और कब तक चलेगा?
- क्या आपकी अनुमति का मतलब यही है कि जनता को सड़क पर चलने का अधिकार भी छीन लिया जाए?
- आपकी चुप्पी क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि ‘धर्म के व्यापारियों’ को आपका मौन समर्थन प्राप्त है?
‘संसद वाणी’ आपसे जवाब मांगती है। याद रखिए, पद की गरिमा जनता की सेवा करने में होती है, न कि उसे दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर करने में। हम इस लड़ाई को तब तक जारी रखेंगे जब तक मुंबई के फुटपाथ वापस जनता के लिए आजाद नहीं हो जाते।
जवाब दीजिए कमिश्नर, जनता अब और जवाब का इंतजार नहीं करेगी!