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नई दिल्ली: देश में हिंदी भाषा को लेकर चल रही बहस के बीच, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का एक नया कदम राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। खबर है कि सोमवार, 17 नवंबर 2025 को, उन्होंने केरल से सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास को उनके एक आधिकारिक पत्र का जवाब मलयालम भाषा में दिया है। यह पहली बार है जब किसी केंद्रीय गृह मंत्री ने किसी क्षेत्रीय सांसद को उनकी ही भाषा में आधिकारिक रूप से जवाब भेजा है, खासकर ऐसे समय में जब दक्षिण भारत में ‘हिंदी थोपे जाने’ के आरोप चरम पर हैं।
“विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल केरल का दांव नहीं है, बल्कि यह बीजेपी की ‘मिशन साउथ’ रणनीति का हिस्सा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस कदम को नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में भी सकारात्मक रूप से पेश किया जाएगा, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सरकार सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करती है। हालांकि, तमिलनाडु में मुख्य विपक्षी दल DMK ने इसे तुरंत ‘चुनावी नौटंकी’ कहकर खारिज कर दिया है, और पूछा है कि अगर भाषा का इतना सम्मान है, तो केंद्रीय नौकरियों की परीक्षाओं में क्षेत्रीय भाषाओं को अनिवार्य क्यों नहीं किया जाता?”
एक ‘प्रक्रियात्मक’ जवाब, जिसके हैं बड़े राजनीतिक मायने!
सांसद ब्रिटास ने केंद्र सरकार के ‘ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया’ (OCI) पंजीकरण रद्द करने संबंधी एक अधिसूचना को लेकर गृह मंत्री को पत्र लिखा था। हालांकि, अमित शाह का यह जवाब विषय-वस्तु के लिहाज़ से भले ही ‘प्रक्रियात्मक’ (सिर्फ पत्र मिलने की पुष्टि) था, लेकिन इसके साथ पूर्ण मलयालम संस्करण का जोड़ा जाना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संकेत है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बीजेपी की उस रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसके तहत वह केरल में अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है। अगले साल होने वाले केरल विधानसभा चुनाव से पहले यह ‘भाषा प्रेम’ बीजेपी के लिए एक सकारात्मक माहौल बना सकता है। पार्टी पर हिंदी थोपने के आरोपों के बीच, शाह का यह कदम क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति सम्मान दिखाने का एक प्रयास माना जा रहा है।
सांसद ब्रिटास ने क्या कहा?
सांसद जॉन ब्रिटास लगातार संसद में भाषाई समानता की वकालत करते रहे हैं और दक्षिण के सांसदों के लिए हिंदी में लंबी स्पीच को समझना मुश्किल बताते रहे हैं। उन्होंने शाह के इस कदम की सराहना की है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि OCI नियमों से जुड़े संवैधानिक मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि केरल की राजनीति और व्यापक रूप से ‘हिंदी थोपो’ विवाद पर गृह मंत्री का यह अप्रत्याशित ‘मलयालम जवाब’ क्या असर डालता है। क्या यह सिर्फ एक चुनावी चाल है, या भारतीय भाषाओं के प्रति केंद्र सरकार के रुख में एक वास्तविक बदलाव?