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नई दिल्ली: भारत की राजनीतिक और सामाजिक हलचल इन दिनों सोशल मीडिया पर जोरों-शोरों से चर्चा में है। मामला लद्दाख के मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अलग-अलग मुलाकातों से जुड़ा है, जो एक तस्वीर के जरिए फिर से सुर्खियों में आ गया है। ट्विटर (X) पर यूजर गीतांजलि एंग्मो ने एक पोस्ट में सवाल उठाया है कि अगर पीएम मोदी का बांग्लादेश के अंतरिम सलाहकार मुहम्मद यूनुस से मिलना ठीक है, तो फिर वांगचुक का उनसे मिलना क्यों विवादास्पद बनाया जा रहा है?
क्या है पूरा मामला?
गीतांजलि एंग्मो की पोस्ट में दो तस्वीरें साझा की गई हैं। पहली तस्वीर में पीएम मोदी और मुहम्मद यूनुस को अप्रैल 2025 में बंगाल की खाड़ी बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग पहल (BIMSTEC) शिखर सम्मेलन के दौरान हाथ मिलाते हुए दिखाया गया है। दूसरी तस्वीर में सोनम वांगचुक को यूनुस के साथ गले मिलते हुए देखा जा सकता है, जो साल 2020 में ब्रिटिश हाई कमीशन, ढाका में ली गई थी। इस पोस्ट ने सवाल खड़ा किया कि क्या दोनों मुलाकातों में अंतर को समझने की जरूरत नहीं है, और क्या वांगचुक को लेकर चल रही आलोचना में पक्षपात है?
पृष्ठभूमि: कौन हैं मुहम्मद यूनुस?
मुहम्मद यूनुस, एक नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री, वर्तमान में बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार हैं, जिन्हें अगस्त 2024 में शेख हसीना के इस्तीफे के बाद यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। यूनुस माइक्रोक्रेडिट और माइक्रोफाइनेंस के आधुनिक विचार के जनक माने जाते हैं। हालांकि, हाल के महीनों में भारत में उनकी छवि विवादों में रही है, खासकर बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों पर हो रहे हमलों को लेकर। 2024-25 के दौरान सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं ने भारत में उनकी आलोचना को बढ़ावा दिया है, जिसके चलते उनकी किसी भी भारतीय हस्ती से मुलाकात को संवेदनशील माना जा रहा है।
पीएम मोदी की मुलाकात: राजनयिक कर्तव्य
पीएम मोदी की यूनुस से मुलाकात BIMSTEC सम्मेलन के तहत हुई, जो सात देशों (बांग्लादेश, भूटान, भारत, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका और थाईलैंड) के बीच आर्थिक और तकनीकी सहयोग का मंच है। यह मुलाकात औपचारिक और कूटनीतिक थी, जिसमें सभी सदस्य देशों के नेताओं से हाथ मिलाना सम्मेलन का हिस्सा था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुलाकात भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने के लिए एक (प्रोटोकॉल) थी, न कि व्यक्तिगत संबंधों का प्रतीक।
सोनम वांगचुक की मुलाकात: व्यक्तिगत बंधन या विवाद?
दूसरी ओर, सोनम वांगचुक, जो लद्दाख में पर्यावरण और स्वायत्तता के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं, की यूनुस के साथ गले मिलने की तस्वीर को व्यक्तिगत आत्मीयता के रूप में देखा जा रहा है। यह मुलाकात 2020 में हुई थी, जब वांगचुक यूनुस के माइक्रोफाइनेंस मॉडल से प्रेरणा लेने गए थे। हालांकि, अब इस तस्वीर को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या वांगचुक का यूनुस से संबंध बांग्लादेश में हो रही सांप्रदायिक हिंसा से जोड़ा जा सकता है? हाल ही में लद्दाख में उनकी अगुआई में हुए प्रदर्शनों को लेकर भी सरकार ने उन्हें हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं
गीतांजलि की पोस्ट के बाद ट्विटर पर 500 से अधिक जवाब आए हैं। अधिकांश यूजर्स ने दोनों मुलाकातों के बीच अंतर को रेखांकित किया। एक यूजर ने लिखा, “पीएम की मुलाकात राजनयिक कर्तव्य है, जबकि वांगचुक की मुलाकात व्यक्तिगत है। इनका तुलना करना गलत है।” दूसरे यूजर ने वांगचुक पर निशाना साधते हुए कहा, “वह बांग्लादेश में हिंदुओं की हिंसा के पीछे के लोगों से मिल रहे हैं, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है।” कुछ यूजर्स ने वांगचुक की गिरफ्तारी की मांग भी की, जबकि अन्य ने उनकी पर्यावरण कार्यकर्ता छवि का बचाव किया।
सरकार का रुख25 सितंबर 2025 को सरकार ने लद्दाख हिंसा के लिए सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराया था। अधिकारियों का कहना है कि उनकी उत्तेजक बातों ने भीड़ को भड़काया, जिसके परिणामस्वरूप चार मौतें और 60 से अधिक लोग घायल हुए। दूसरी ओर, वांगचुक का दावा है कि वे लद्दाख को छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा दिलाने के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन चला रहे हैं।
यह मामला अब सिर्फ दो तस्वीरों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय एकता, कूटनीति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल बन गया है। जहां एक ओर पीएम मोदी की मुलाकात को कूटनीतिक जरूरत माना जा रहा है, वहीं वांगचुक की मुलाकात को लेकर सियासी और सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है। आने वाले दिनों में इस बहस का असर भारत-बांग्लादेश संबंधों और लद्दाख के आंदोलन पर भी पड़ सकता है।
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