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श्री भैरव उत्पत्ति कथा — जब भगवान शिव ने लिया भैरव रूप
कैसे भैरव बने काशी के कोतवाल, ब्रह्महत्याप्रायश्चित और भक्तों के रक्षक।भैरव देवता, भगवान शिव के उग्रतम और न्यायप्रिय स्वरूप माने जाते हैं। वे पापों का नाश करने वाले, धर्म की रक्षा करने वाले और भक्तों के रक्षक हैं। स्कंद पुराण में उनके जन्म की कथा अत्यंत दिव्य और ज्ञानवर्धक है।
भैरव रूप की उत्पत्ति
एक बार सुमेरु पर्वत पर ब्रह्मा आदि देवता और ऋषिगण उपस्थित थे। ऋषियों ने प्रश्न किया — “हे प्रभो! आप सबमें सबसे बड़ा देवता कौन है?” अहंकारवश ब्रह्माजी ने कहा, “मैं ही सृष्टि का कर्ता हूँ, इसलिए मैं ही सबसे बड़ा ईश्वर हूँ।” यह सुनकर श्री नारायण के अंश ऋतु को क्रोध आया और बोले, “अरे ब्रह्मा! तुम अज्ञान के वशीभूत हो। सृष्टि का कर्ता, पालक और संहारक तो मैं हूँ।”
वेदों से प्रमाण
ऋग्वेद: “रूद्र ही परम तत्व हैं।”
यजुर्वेद: “योग द्वारा जिसे प्राप्त किया जाता है, वही शिव हैं।”
सामवेद: “जिसके प्रकाश से विश्व प्रकाशित है, वह त्र्यम्बक हैं।”
अथर्ववेद: “जो भक्तों के कष्ट हरते हैं, वही भगवान शंकर हैं।”
फिर भी अहंकार से भरे ब्रह्मा और ऋतु के बीच एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। उसी ज्योति से एक तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ — वह था भैरव।
भैरव का प्राकट्य और दण्ड
जब ब्रह्माजी ने बालक को देखा तो बोले — “तुम मेरे मस्तक से उत्पन्न हुए हो, इसलिए तुम्हारा नाम रूद्र होगा।” परन्तु वह बालक शीघ्र ही भैरव रूप में परिवर्तित हुआ। भैरव ने ब्रह्मा के पाँचवे मस्तक को काट डाला, जिसने शिव की निन्दा की थी। उसी क्षण ब्रह्मा को अपनी भूल का ज्ञान हुआ और वे शिवजी की स्तुति करने लगे।
शिव की आज्ञा — प्रायश्चित यात्रा
शिवजी ने भैरव को आज्ञा दी कि वे ब्रह्मा का कटे हुए मस्तक को हाथ में लेकर भिक्षा याचना करते हुए तीनों लोकों में भ्रमण कर ब्रह्महत्या के पाप का प्रायश्चित करें। शिवजी ने उसी समय ब्रह्महत्यां नाम की एक भीषण कन्या उत्पन्न की और कहा कि वह भैरव का पीछा करती रहेगी पर काशीपुरी में प्रवेश कर नहीं सकेगी।भैरव हाथ में खप्पर लेकर देवलोक, मनुष्यलोक और पाताललोक का भ्रमण करने लगे। यह उनकी प्रायश्चित यात्रा थी — जिसमें वे पापों के दंश और मुक्ति का संदेश देते हुए चले।
काष्ठ मोचन — काशी में मुक्ति
जब भैरव काशीपुरी पहुँचे, तो ब्रह्महत्यां वहीं रुक गई क्योंकि वह शिव की प्रिय नगरी में प्रवेश नहीं कर सकती थी। उसी समय भैरव के हाथ से ब्रह्मा का खप्पर गिर पड़ा; जिस स्थान पर वह गिरा वह स्थान आज कपालमोचन के नाम से प्रसिद्ध है।ब्रह्मा ने काशी के लोगों को दण्ड देने का अधिकार भैरव को दिया; तब से भगवान भैरव को “काशी का कोतवाल” कहा गया।
मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी — जन्मोत्सव
भगवान भैरवनाथ जी को भगवान सदाशिव का प्रतिरूप माना जाता है। उनका जन्म मार्गशीर्ष (अगहन) मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी को हुआ था — जिसे कालाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है।जो व्यक्ति इस तिथि या किसी भी मास की अष्टमी को भैरव का व्रत, स्मरण या पूजन करता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति छह मास तक उक्त तिथियों में श्रद्धापूर्वक भैरव की उपासना करता है, उसे सिद्धि प्राप्त होती है।
क्या आप जानते हैं?
कपालमोचन आज भी काशी का प्रसिद्ध तीर्थ है — जहां ब्रह्मा का मस्तक गिरा माना जाता है।
भैरव को काला वस्त्र, तेल और काले कुत्ते का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है।
कालाष्टमी को भैरव जी की विशेष पूजा से पापों की नाशना की मान्यता है।
अष्ट भैरव — भगवान कालभैरव के आठ स्वरूप
भगवान कालभैरव के आठ मुख्य रूपों को अष्ट भैरव कहा जाता है। ये आठों रूप आठ दिशाओं के अधिपति हैं और सृष्टि, पालन, संहार तथा मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की रक्षा करते हैं।
असितांग भैरव (पूर्व दिशा) — ज्ञान और शुद्धता के देवता; ब्रह्माणी शक्ति के साथ।
रुरु भैरव (आग्नेय दिशा) — धर्म और कला के रक्षक; कौमारी शक्ति के साथ।
चण्ड भैरव (दक्षिण दिशा) — अधर्म का संहारक; वाराही शक्ति के साथ।
क्रोध भैरव (नैऋत्य दिशा) — न्याय और दण्ड के देवता; इन्द्राणी शक्ति के साथ।
उन्मत्त भैरव (पश्चिम दिशा) — मोक्ष और आत्मज्ञान के दाता; चामुंडा शक्ति के साथ।
कपाल भैरव (वायव्य दिशा) — वैराग्य और तप के प्रतीक; यमी शक्ति के साथ।
भीषण भैरव (उत्तर दिशा) — भय और बाधाओं के नाशक; महेश्वरी शक्ति के साथ।
संहार भैरव (ईशान दिशा) — लय और मोक्ष के अधिपति; नृसिंही शक्ति के साथ।
अष्ट भैरव मंत्र: ॐ अष्ट भैरवाय नमः॥जो साधक इन आठों भैरवों की उपासना करता है, उसे जीवन में साहस, सिद्धि, धन, प्रतिष्ठा और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
निष्कर्ष
भैरव की उपासना श्रद्धा, भक्ति और नियम से करने पर भक्तों को मुक्ति, सिद्धि और निर्भयता प्राप्त होती है।
“भैरव की उपासना करता है, उसे सिद्धि प्राप्त हो जाती है।”
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