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लखनऊ, 20 जनवरी 2026 — देश की विधायी संस्थाओं को और अधिक प्रभावी, पारदर्शी व उत्तरदायी बनाने के उद्देश्य से 86वां अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन आज लखनऊ में प्रारंभ हुआ। यह सम्मेलन लोकसभा अध्यक्षों, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्षों, विधान परिषदों के सभापतियों तथा वरिष्ठ विधायी अधिकारियों का एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच है।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने, सदन की कार्यवाही में अनुशासन, विधायी दक्षता बढ़ाने और तकनीक के बेहतर उपयोग जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र की मजबूती पीठासीन अधिकारियों की निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है।
राजनीतिक दृष्टि से यह सम्मेलन इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि हाल के वर्षों में सदनों की कार्यवाही में बढ़ते व्यवधान, विधेयकों पर सीमित चर्चा और विपक्ष-सत्ता पक्ष के बीच टकराव जैसे मुद्दे सुर्खियों में रहे हैं। सम्मेलन में इन चुनौतियों से निपटने के लिए सर्वसम्मत आचार-संहिता, समयबद्ध विधायी बहस और सदन की कार्यवाही के डिजिटलीकरण पर ठोस सुझाव रखे गए।
आयोजकों के अनुसार, अगले सत्रों में ई-विधान, संसदीय समितियों की भूमिका, जनप्रतिनिधियों के आचरण मानक और राज्यों के बीच सर्वोत्तम विधायी प्रथाओं के आदान-प्रदान पर भी मंथन होगा। सम्मेलन से निकलने वाले निष्कर्ष देश की विधायी प्रक्रिया को नई दिशा देने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
राजनीतिक महत्व
- सदनों की कार्यवाही में अनुशासन और मर्यादा पर राष्ट्रीय सहमति बनाने की पहल
- विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच संवाद को संस्थागत रूप देने पर जोर
- तकनीक के माध्यम से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के प्रस्ताव
यह सम्मेलन न केवल विधायी संस्थाओं की कार्यप्रणाली को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी संकेत देता है।