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लखनऊ, 5 फरवरी 2026 — उत्तर प्रदेश के Allahabad High Court ने प्रदेश में लापता व्यक्तियों की बढ़ती संख्या और पुलिस की जांच में गंभीरता के अभाव को लेकर चिंता जताई है। अदालत ने पाया है कि पिछले लगभग दो वर्षों में **राज्य में लगभग 1,08,300 लोग गुम हुए हैं, लेकिन पुलिस ने इन मामलों में सिर्फ लगभग 9,700 मामलों में ही कार्रवाई की है।
यह मामला एक ऐसे परिवार से जुड़ी याचिका के दौरान सामने आया, जिसमें याची का बेटा जुलाई 2024 से लापता है। याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने पुलिस की सुस्त प्रतिक्रिया और शिकायतों पर त्वरित कारवाई न किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई।
क्या हैं हाई कोर्ट की मुख्य चिंताएँ?
- अदालत ने फरियादियों द्वारा दर्ज कराई गई गुमशुदगी की शिकायतों में केवल 9% से भी कम मामलों में ही असरदार कार्रवाई देखने को मिली है, जो कि बेहद चौंकाने वाला आंकड़ा है।
- न्यायालय ने यह टिप्पणी भी की कि इस स्थिति से यह पता चलता है कि अधिकारी लापता लोगों के मामलों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।
- इसके मद्देनज़र हाई कोर्ट ने इस पूरे मुद्दे को जनहित का मामला मानते हुए एक Public Interest Litigation (PIL) दर्ज करने का निर्देश दिया और सुनवाई अगली तारीख़ के लिए सूचीबद्ध की है।
राज्य पुलिस और प्रशासन के लिए निर्देश
कोर्ट ने क्रमिक निर्देश देते हुए राज्य के गृह विभाग और पुलिस महानिदेशक (DGP) से स्पष्ट आंकड़ों, जांच की प्रगति और प्रभावी विधिक कार्रवाई का विवरण तलब किया है। अदालत ने कहा कि अगर पुलिस प्रारंभिक चरण में ही गंभीरता से कदम नहीं उठाती तो लापता व्यक्तियों को ढूँढने की संभावना और भी कम हो जाएगी।
विश्लेषण: क्या है समस्या की जड़?
विश्लेषण से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में लापता व्यक्तियों के मामलों में पुलिस की प्रतिक्रिया काफी कम और धीमी रही है, जिससे परिवारों और समाज में निराशा बढ़ रही है। ऐसे मामलों में जांच की गति और प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं, जिनके लिए अदालत ने अब स्वयं संज्ञान लिया है।