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मुंबई (संसद वाणी): आर्थिक राजधानी के मालाड इलाके से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अवैध निर्माण के खिलाफ आवाज उठाना एक जागरूक नागरिक के लिए जानलेवा साबित हुआ।
घटना का विवरण: शिकायत की मिली ‘खूनी’ सजा
सजग नागरिक जिग्नेश परमार ने मालाड में नियमों को ताक पर रखकर किए जा रहे अवैध निर्माण के खिलाफ BMC में शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत से बौखलाए भू-माफिया कर्सन ने जिग्नेश पर जानलेवा हमला कर दिया। जिग्नेश का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने एक जिम्मेदार नागरिक होने का फर्ज निभाया था।
पुलिस की भूमिका पर सवाल: FIR दर्ज करने में लगा पूरा एक दिन
सबसे ज्यादा चौंकाने वाला पहलू पुलिस प्रशासन का रहा। जब घायल जिग्नेश FIR दर्ज कराने मालाड पुलिस स्टेशन पहुंचे, तो वहां मौजूद वरिष्ठ अधिकारियों का रवैया टालमटोल वाला रहा। पीड़ित का आरोप है कि अधिकारी बार-बार “करता हूँ, करता हूँ” कहते रहे और इस संगीन मामले में FIR दर्ज करने में पूरा एक दिन (24 घंटे) लगा दिया।
बड़ा सवाल: क्या पुलिस प्रशासन भू-माफिया के दबाव में काम कर रहा है? हमलावर को बचाने या सबूत मिटाने के लिए यह समय दिया गया?
BMC की विफलता: एक साल से नोटिस का नहीं हुआ असर
जांच में यह भी सामने आया है कि जिस अवैध निर्माण की शिकायत जिग्नेश ने की थी, उस पर BMC पहले ही नोटिस जारी कर चुकी है। लेकिन सवाल यह है कि नोटिस जारी होने के एक साल बाद भी BMC ने उस अवैध निर्माण को ध्वस्त क्यों नहीं किया? क्या बीएमसी के अधिकारी और भू-माफिया के बीच कोई गुप्त साठगांठ है?
प्रशासन से संसद वाणी के सीधे सवाल:
पुलिस विभाग से: जानलेवा हमले जैसे मामले में तुरंत FIR क्यों नहीं हुई? वरिष्ठ अधिकारियों की इस सुस्ती का जिम्मेदार कौन है?
BMC प्रशासन से: एक साल से अवैध निर्माण सीना तानकर कैसे खड़ा है? नोटिस सिर्फ कागजी खानापूर्ति के लिए था या कार्रवाई के लिए?
नेताओं से: मालाड के जनप्रतिनिधि इस माफिया राज पर खामोश क्यों हैं?
निष्कर्ष:
यह घटना दर्शाती है कि मालाड में सिस्टम और माफिया का गठजोड़ किस कदर हावी है। अगर एक आम नागरिक सुरक्षित नहीं है और पुलिस-प्रशासन माफिया के आगे नतमस्तक है, तो लोकतंत्र में जनता का भरोसा कैसे कायम रहेगा?