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संपादकीय: ‘मौन’ का संरक्षण और रेंगता प्रशासन—क्या माफियाओं के आगे नतमस्तक है तंत्र?

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किसी भी जीवंत लोकतंत्र में पत्रकारिता का धर्म केवल खबर देना नहीं, बल्कि सोए हुए हुक्मरानों की अंतरात्मा को झकझोरना भी है। ‘संसद वाणी’ पिछले 18 दिनों से मालाड वार्ड 35 की ‘कोयला वाली गली’ में हो रहे उस अवैध निर्माण की चीखें प्रशासन तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा है, जो न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि रेलवे सुरक्षा के लिए एक टाइम-बम की तरह है। लेकिन अफसोस! 18 दिन बीत गए, हमारी स्याही नहीं सूखी, मगर शासन की संवेदनशीलता सूख चुकी है।


नोटिस का मखौल और बेबस कानून

हैरानी इस बात पर होती है कि जिस अवैध निर्माण के खिलाफ 21 मई 2025 को बीएमसी ने खुद नोटिस जारी किया था, वह आज एक साल बाद भी सीना ताने खड़ा है। पी/उत्तर विभाग के सहायक आयुक्त कुंदन रा. वळवी जैसे अधिकारियों की छवि कड़क कार्रवाई करने वाली रही है, लेकिन इस मामले में उनकी ‘रहस्यमयी सुस्ती’ कई सवाल खड़ी करती है।

क्या बीएमसी के नियम केवल उन गरीबों के लिए हैं जिनकी झोपड़ियों पर बुलडोजर बिना नोटिस के चल जाता है? या फिर ‘कर्सन’ जैसे रसूखदार भू-माफियाओं के लिए कानून के हाथ जानबूझकर छोटे कर दिए जाते हैं?


• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


जनप्रतिनिधियों का ‘चुनावी’ मौन

सबसे ज्यादा निराशा क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों से होती है। सांसद पीयूष गोयल और नगरसेवक योगेश वर्मा की चुप्पी अब चुभने लगी है। एक तरफ हम डिजिटल इंडिया और सुरक्षित भारत की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ रेल की पटरियों के पास माफियाओं को अवैध साम्राज्य खड़ा करने की छूट दी जा रही है।

  • क्या माननीय सांसद महोदय को 18 दिनों तक चली यह मुहिम नजर नहीं आई?
  • क्या सत्ता का ‘अहंकार’ इतना बढ़ गया है कि जनता की सुरक्षा से ज्यादा भू-माफियाओं के हित सर्वोपरि हो गए हैं?

यह केवल एक अवैध दीवार का मामला नहीं है, बल्कि उस भरोसे का कत्ल है जो जनता ने ‘अच्छे दिन’ और ‘सुरक्षित मुंबई’ के नाम पर अपने नेताओं पर किया था।

हमारा संकल्प

‘संसद वाणी’ यह स्पष्ट कर देना चाहता है कि हम किसी राजनीतिक द्वेष से नहीं, बल्कि जनहित की भावना से प्रेरित हैं। प्रशासन चाहे जितना भी मौन रहे, सत्ता चाहे जितनी भी बेरुखी दिखाए, हमारी आवाज दबने वाली नहीं है। जब तक ‘कोयला वाली गली’ का यह अवैध ढांचा ध्वस्त नहीं होता और दोषियों की जवाबदेही तय नहीं होती, वशिष्ठ वाणी प्रशासन के द्वार पर दस्तक देता रहेगा।

वक्त आ गया है कि जनता पूछे—साहब, यह चुप्पी मजबूरी है या मिलीभगत?

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