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आईएएस-आईपीएस या नेताओं के नौकर? अफसरशाही के पतन की खौफनाक हकीकत!

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• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


जब कोई युवा आईएएस (IAS) या आईपीएस (IPS) बनने के लिए दिन-रात एक करता है, तो उसके आदर्श आसमान छू रहे होते हैं। साक्षात्कार में उनका सबसे रटा-रटाया और आदर्शवादी जवाब यही होता है—”मैं जनता की सेवा करना चाहता हूँ और समाज में हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहता हूँ।” लेकिन एक बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि पद और कुर्सी मिलते ही इन अधिकारियों के भीतर यह बेतहाशा ‘अहंकार’ कहाँ से आ जाता है?

जनता के लिए बंद दरवाज़े, मंत्रियों के लिए बिछी पलकें

आज के समय में खुद से पूछिए, क्या एक आम नागरिक अपनी किसी गंभीर परेशानी को लेकर सीधे पुलिस कमिश्नर या किसी आला दर्जे के अधिकारी से मिल सकता है? जवाब है—बिल्कुल नहीं। चुनाव जीतने के बाद जिस तरह एक राजनेता आम जनता की पहुँच से दूर हो जाता है और प्रोटोकॉल के आवरण में छिप जाता है, ठीक वही वीआईपी कल्चर इन अधिकारियों ने भी अपना लिया है। शायद उन्हें लगता है कि अगर वे आम जनता से आसानी से मिलने लगे और उनकी फरियाद सीधे सुनने लगे, तो उनका रुतबा और उनकी अहमियत खत्म हो जाएगी।

लेकिन इसी सिक्के का दूसरा पहलू देखिए। जब किसी मंत्री या रसूखदार नेता का फोन आता है या कोई आदेश मिलता है, तो यही अधिकारी सारे नियम-कानून ताक पर रखकर दौड़ पड़ते हैं। तब उनका एकमात्र ध्येय यह रह जाता है कि कैसे ‘नेता जी’ को खुश किया जाए, ताकि भविष्य में प्रमोशन और मलाईदार पोस्टिंग का रास्ता साफ हो सके।

सत्ता की चाटुकारिता का चरम: मुंबई पुलिस का हालिया कारनामा

अगर किसी को इस व्यवस्थागत पतन पर यकीन न हो, तो हाल ही में मुंबई पुलिस के रवैये को देख सकता है। एक व्यक्ति ने राजनीतिक विरोध स्वरूप “अमित शाह मुर्दाबाद” का नारा क्या लगा दिया, मुंबई पुलिस कमिश्नर ने उस व्यक्ति के खिलाफ सीधा ‘तड़ीपार’ (Externment) का आदेश जारी कर दिया।

सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस प्रशासन का तंत्र अब जनता की सुरक्षा के लिए काम कर रहा है, या केवल सत्ताधीशों के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को कुचलने के लिए? तड़ीपारी जैसे गंभीर कानून का यह मनमाना इस्तेमाल किसके लिए था—दिल्ली में बैठे अमित शाह को खुश करने के लिए, या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की गुडबुक में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए? इस पूरे प्रकरण में वह आम जनता कहाँ है, जिसकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है?

न्यायालय का चाबुक और आम आदमी की बेबसी

यह तो गनीमत है कि बंबई उच्च न्यायालय ने इस मामले में एक बेहतरीन और निष्पक्ष फैसला सुनाया। अदालत ने न केवल तड़ीपार के आदेश को खारिज किया, बल्कि मुंबई पुलिस को कड़ी फटकार भी लगाई।

लेकिन यह घटना एक खौफनाक तस्वीर भी पेश करती है। सोचिए, इस शहर में ऐसे कितने ही आम नागरिक होंगे जिन्हें इन अधिकारियों के अहंकार और सत्ता-प्रेम के कारण रोज प्रताड़ित होना पड़ता होगा। हर गरीब या मध्यम वर्गीय व्यक्ति के पास इतने संसाधन नहीं होते कि वह पुलिसिया ज्यादती के खिलाफ न्याय मांगने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सके। जो हाई कोर्ट नहीं पहुँच पाते, उनकी जिंदगी तो इन्हीं अहंकारी अधिकारियों की फाइलों में दबकर रह जाती है।

सेवाभाव या चाकरी?

यह एक बेहद गंभीर और विचारणीय विषय है कि जिन आईएएस और आईपीएस अधिकारियों का मूल दायित्व जनता की सेवा करना और संविधान की रक्षा करना है, वे आज राजनेताओं की चाकरी करने में ही अपनी सफलता मान रहे हैं। जब तक देश का नौकरशाह अपनी वर्दी और पद का इस्तेमाल जनता की भलाई के बजाय नेताओं को खुश करने के लिए करता रहेगा, तब तक आम आदमी यूं ही न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर रहेगा।

वक्त आ गया है कि अधिकारी अपनी शपथ को याद करें—वे इस देश की जनता के सेवक हैं, किसी नेता या मंत्री की निजी सेना नहीं।


क्या आप चाहेंगे कि इस सम्पादकीय के अंत में हम किसी ऐसे विशेष अधिकारी का नाम (उदाहरण के तौर पर) भी जोड़ें जिसने इस ‘वीआईपी कल्चर’ के खिलाफ जाकर जनता के बीच मिसाल कायम की हो, ताकि लेख का प्रभाव और भी संतुलित हो सके?

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