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मुंबई: मुंबई की बारिश और नागरिक प्रशासन की बदइंतजामी का जो खौफनाक मेल हर मानसून में देखने को मिलता है, वह इस बार ‘राम मंदिर नाले’ के उफान के रूप में फिर से सामने आया है। भारी बारिश के बाद नाले का विकराल रूप देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरी मुंबई पानी में समा गई हो। चारों ओर जलभराव की तस्वीरें न केवल डरावनी हैं, बल्कि बीएमसी (BMC) के मानसून-पूर्व तैयारियों के दावों को पूरी तरह से आईना भी दिखा रही हैं।
हर साल मानसून दस्तक देने से पहले प्रशासन बड़े-बड़े वादे करता है, करोड़ों के बजट की खबरें छपती हैं और नालों की सफाई के दावे किए जाते हैं। लेकिन जैसे ही आसमान से बारिश की कुछ बूंदें गिरती हैं, शहर की सड़कें नहरों में और इलाके जलमग्न हो जाते हैं। राम मंदिर नाले की यह दुर्दशा केवल एक घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की उस ‘कागजी कार्यप्रणाली’ का परिणाम है, जहाँ काम से ज्यादा कागजों पर पन्ने रंगने का काम होता है।
सवाल यह है कि आखिर मुंबई की जनता को हर वर्ष इसी तरह की बदहाली और जान जोखिम में डालने वाली परेशानियों का सामना कब तक करना पड़ेगा? क्या मुंबई का बुनियादी ढांचा इतना खोखला हो चुका है कि कुछ घंटों की बारिश ही शहर की कमर तोड़ देती है? जनता का टैक्स पानी में बह रहा है, लेकिन समाधान के नाम पर हर साल सिर्फ आश्वासन और तमाशा ही मिलता है।
क्या यह शहर अब बारिश में डूबने के लिए ही अभिशप्त है, या फिर अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय सिर्फ एक और मानसून बीत जाने का इंतज़ार कर रहे हैं?