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Kerala High Court: कोर्ट ने कहा एक महिला को यह अधिकार है कि वह कब बच्चे पैदा करना चाहती है, कितने बच्चे पैदा करना चाहती है. साथ ही उसे सुरक्षित और कानूनी गर्भपात कराने का भी अधिकार है.
केरल हाई कोर्ट ने एक रेप पीड़िता को उसके 28 महीने के गर्भ को गिराने की अनुमति देते हुए कहा कि एक रेप पीड़िता को एक ऐसे शख्स के बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नही किया जा सकता जिसने उसका बलात्कार किया हो. कोर्ट ने कहा कि अगर हम ऐसा करते हैं तो यह पीड़िता को सम्मान के साथ जीने के मानवाधिकार से वंचित करने जैसा होगा.
‘बलात्कारी के बच्चे को पैदा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते’
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एडप्पागथ ने कहा, ‘रेप पीड़िता को एक ऐसे शख्स के बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नही किया जा सकता जिसने उसका बलात्कार किया हो. अनचाहे गर्भ को चिकित्सकीय रूप से गिराने की अनुमति न देना उस पर मातृत्व की जिम्मेदारी थोपने जैसा होगा और यह पीड़िता को सम्मान के साथ जीने के मानवाधिकार से वंचित करने जैसा होगा, जो उसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले हुए हैं.’
जस्टिस एडप्पागथ ने कहा कि एक महिला या लड़की का अपने शरीर या प्रजनन कार्यों के बारे में स्वायत्त निर्णय लेने का अधिकार समानता और गोपनीयता के उनके मौलिक अधिकारों के मूल में है.
‘प्रजनन को लेकर फैसला लेना महिलाओं का अधिकार’
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए जिसमें उसने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अपने प्रजनन के बारे में फैसला लेना महिलाओं का संवैधानिक अधिकार है, जस्टिस एडप्पागथ ने कहा कि एक महिला को यह अधिकार है कि वह कब बच्चे पैदा करना चाहती है, कितने बच्चे पैदा करना चाहती है. साथ ही उसे सुरक्षित और कानूनी गर्भपात कराने का भी अधिकार है.
नाबालिग रेप पीड़िता ने कोर्ट से लगाई थी गुहार
बता दें कि एक 16 वर्षीय नाबालिग रेप पीड़िता ने कोर्ट से गर्भवात की अनुमति देने की गुहार लगाई थी. पीड़िता की मां ने अपनी याचिका में कहा था कि ऐसा न करने की स्थिति में उनकी बेटी और उसके बच्चे के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.
याचिका में कहा गया था कि 11वीं कक्षा में पढ़ने के दौरान उसके एक 19 वर्षीय प्रेमी ने उसका यौन शोषण किया था जिसके बाद वह गर्भवती हो गई थी. इसके बाद आरोपी के खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं और पॉक्सो एक्ट के तहत रेप का मामला दर्ज किया गया था.
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि ज्यादातर मामलों बिना शादी के गर्भावस्था हानिकारक होती है, विशेष तौर पर तब जब महिला का यौन उत्पीड़न या रेप किया गया हो. इस स्थिति में गर्भवती महिला के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है.
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