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नीतीश कुमार और चंदबाबू नायडू को देना ही होगा NDA का साथ, जानें क्या है मजबूरी 

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Nitish Kumar and Chandrababu Naidu: एनडीए ने सरकार बनाने के लिए जरूरी 272 सीटों के बहुमत के आंकड़े को तो छू लिया है लेकिन बीजेपी 239 सीटों के साथ बहुमत पाने से चूक गई.

2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम के साथ ही भाजपा के सामने एक नई चुनौती आन पड़ी है. पिछले 10 साल में जिस भाजपा ने अपने दम पर सरकार चलाई उसे अब तीसरी बार सत्ता में आने के लिए अपने सहयोगी दलों के सामने झुकने पर मजबूर होना पड़ेगा. दरअसल एनडीए ने सरकार बनाने के लिए जरूरी 272 सीटों के बहुमत के आंकड़े को तो छू लिया है लेकिन बीजेपी 239 सीटों के साथ बहुमत पाने से चूक गई. इसलिए उसे 10 सालों में पहली बार अपने सहयोगियों  विशेषकर टीडीपी और जेडीयू पर निर्भर रहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. ऐसे में कई लोगों के मन में यह आशंका है कि टीडीपी और जेडीयू को एनडीए का साथ मिलेगा या नहीं.

यहां हम आपको बताएंगे कि दोनों दल के सामने एनडीए में बने रहने की क्या मजबूरियां हैं और अगर उन्होंने साथ छोड़ा तो वे किस परिस्थिति में ऐसा करेंगे.

सबसे पहले बात टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू की. चंद्रबाबू नायडू इस समय किंग मेकर की भूमिका में आ गए हैं. चंद्रबाबू नायडू ने जिसका साथ दिया सरकार उसी की बनेगी.

चंद्रबाबू नायडू क्यों देंगे एनडीए का साथ

चंद्रबाबू नायडू के सामने एनडीए का साथ देने के दो प्रमुख कारण हैं. पहला वाई एस रेड्डी के निधन और राज्य के बंटवारे के बाद कांग्रेस पार्टी आंध्र प्रदेश में अपनी लोकप्रियता खो चुकी है.

दूसरा नायडू ने इस बार आंध्र प्रदेश का चुनाव भाजपा के साथ गठबंधन में लड़ा था और ऐसे में अगर वह भाजपा का साथ छोड़ते हैं तो यह राज्य में उन्हें मिले जनादेश के खिलाफ होगा और भविष्य में उन्हें राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है.

नीतीश के पास पलटूराम की छवि बदलने का मौका

दूसरे किंग मेकर हैं जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में नीतीश कुमार एनडीए के एक कद्दावर नेता हुआ करते थे. उस दौरान वह रेलमंत्री भी रहे. हालांकि 2014 के आम चुनाव से पहले चीजें उस वक्त खराब हुईं जब नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाए जाने का करारा विरोध किया क्योंकि उनकी छवि एक धर्मनिर्पेक्ष नेता की नहीं थी. इसके बाद नीतीश ने 2013 में एनडीए छोड़ दी.

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, आरजेडी, जेडीयू और लेफ्ट पार्टियों के महागठबंधन ने भाजपा को करारी शिकस्त दी. हालांकि 2017 में नीतीश ने लालू प्रसाद यादव के साथ काम ना करने का बहाना बनाते हुए महागठबंधन से नाता तोड़ लिया. 2022 में वह फिर से महागठबंधन में शामिल हो गए और 2024 के चुनाव से पहले फिर से पलटी मारते हुए एनडीए में शामिल हो गए.

इसका नतीजा यह हुआ कि बिहार में उनकी छवि एक पलटूराम नेता के तौर पर बन गई. हालांकि लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने कहा था कि वह अब हमेशा भाजपा के साथ ही रहेंगे. ऐसे में उन्हें जनता से किया हुआ अपना यह वादा निभाना होगा. हालांकि यह उनकी मजबूरी तो नहीं है लेकिन उनके पास यह अपनी पलटूराम की छवि सुधारने का मौका जरूर है.

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