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संसद वाणी का ‘BMC’ पर सीधा हमला: मुंबई की सड़कों पर आम आदमी बेबस, ‘धर्म के व्यापारी’ और अवैध पार्किंग का बोलबाला!

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मुंबई: क्या मुंबई महानगरपालिका (BMC) के पास अब कानून का राज कायम रखने की शक्ति नहीं बची है? या फिर ‘धर्म के व्यापारियों’ और अवैध पार्किंग माफियाओं से मिलने वाली ‘मलाई’ ने BMC अधिकारियों की आँखों पर पट्टी बाँध दी है? ‘संसद वाणी’ की एक्सक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट मालाड-कांदिवली इलाके की उस अराजकता को बयां कर रही है, जिसे देखकर कोई भी जागरूक नागरिक शर्मिंदा हो जाए।

कमिश्नर अश्विनी भिड़े, ज़रा इन तस्वीरों पर गौर करें!

संसद वाणी ने अपने कैमरे में जो साक्ष्य कैद किए हैं, वे BMC की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं:

  • फुटपाथ पर अवैध मंडप का कब्ज़ा: फुटपाथ, जो जनता के चलने के लिए बने थे, उन्हें कुछ लोगों ने अपना निजी ‘मंडप’ बना लिया है। पैदल यात्रियों के लिए यहाँ अब कोई जगह नहीं बची है।
  • सड़कें भी अब असुरक्षित: जब फुटपाथ छोटा पड़ा, तो इन अतिक्रमणकारियों ने अब सड़क का बड़ा हिस्सा भी कवर कर लिया है। अब जनता कहाँ से जाए? गाड़ियों के नीचे आकर?
  • अवैध पार्किंग का जाल: जहाँ फुटपाथ पर मंडप का कब्ज़ा है, वहीं सड़क के बाकी हिस्से पर अवैध पार्किंग ने ट्रैफिक की कमर तोड़ दी है।

BMC कमिश्नर अश्विनी भिड़े से ‘संसद वाणी’ का सीधा सवाल

अश्विनी भिड़े मैडम, आप मुंबई की शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी हैं। हम आपसे पूछना चाहते हैं:

  1. क्या मालाड-कांदिवली में आपके वॉर्ड अधिकारियों और इन अतिक्रमणकारियों की मिलीभगत इतनी गहरी हो चुकी है कि अब शहर का ट्रैफिक और नागरिकों की सुरक्षा आपकी प्राथमिकता नहीं रही?
  2. क्या ‘धर्म के नाम’ पर फुटपाथ पर कब्जा करना कानूनन सही है? अगर नहीं, तो फिर ये मंडप अभी तक क्यों खड़े हैं?
  3. जनता की जान जोखिम में डालकर ‘मलाई’ खाने वाले इन लापरवाह अधिकारियों पर आप कब तक मेहरबान रहेंगी?

जनता की सुरक्षा दांव पर

BMC कमिश्नर, आप शहर की सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी हैं। मालाड-कांदिवली में जनता का रास्ता अवरुद्ध है, सुरक्षा नियम तार-तार हैं, और प्रशासन ‘कुंभकर्णी नींद’ में सोया हुआ है। क्या आपको सड़कों पर उतरती इस अराजकता को देखकर शर्म नहीं आती?

यह केवल एक अतिक्रमण का मुद्दा नहीं है, यह ‘जनता के अधिकारों के हनन’ का मुद्दा है। ‘संसद वाणी’ आपको चेतावनी देती है—अगर जल्द ही इन अवैध कब्जों पर बुलडोजर नहीं चला, तो जनता का गुस्सा किसी भी दिन सड़कों पर फूट सकता है।

अब फैसला आपको करना है—आप अतिक्रमणकारियों के साथ खड़ी हैं या मुंबई की उस आम जनता के साथ, जो इन सड़कों का कर चुकाती है?

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