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विशेष विश्लेषण: खाकी का स्वाभिमान और रसूखदारों का पहरा: क्या मुंबई पुलिसिंग में दरकिनार हो रही है आम जनता?

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विशेष खोजी ब्यूरो, मुंबई (संसद वाणी):

एक आईपीएस (IPS) अधिकारी बनने का सपना अक्सर ‘जनसेवा’, ‘निष्पक्षता’ और ‘संविधान की रक्षा’ के जज्बे से शुरू होता है। लेकिन क्या आज महानगर की पुलिसिंग व्यवस्था अपनी मूल शपथ से दूर होती जा रही है? मुंबई के प्रबुद्ध नागरिक, कानूनी विशेषज्ञ और आम जनता आज यह पूछने पर मजबूर हैं कि क्या शीर्ष पदों पर बैठी पुलिसिंग प्रणाली की प्राथमिकताएं अब आम नागरिकों की सुरक्षा से ज्यादा वीआईपी प्रोटोकॉल और राजनीतिक रसूखदारों को संतुष्ट करने तक सीमित हो गई हैं?

चुनिंदा कार्रवाई: जनता के लिए लंबी प्रतीक्षा, रसूखदारों के लिए तत्परता

पुलिस की कार्यशैली में आज एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। आम नागरिक की लिखित शिकायतें हों या सोशल मीडिया पर की गई अपीलें, उन पर त्वरित कार्रवाई तब तक नदारद दिखती है जब तक कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति या सत्ता गलियारों का दखल न हो। प्राथमिकताओं का यह अंतर पुलिस प्रशासन की साख पर सवाल खड़े करता है।

इसका सबसे बड़ा हालिया उदाहरण मुंबई उच्च न्यायालय (Mumbai High Court) के समक्ष आया, जहां पुलिस प्रशासन की कार्यशैली को लेकर अदालत ने बेहद तीखी टिप्पणियां कीं। मामला एक नागरिक (सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी) के खिलाफ पुलिस द्वारा जारी किए गए ‘तड़ीपार’ (Externment) के आदेश से जुड़ा था, जिस पर आरोप था कि उन्होंने विरोध प्रदर्शनों के दौरान राजनीतिक नारेबाजी की थी।

इस पर माननीय उच्च न्यायालय के जजों ने कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में जनता को नीतियों पर असहमति और विरोध जताने का पूरा अधिकार है और इस तरह पुलिसिया शक्तियों का इस्तेमाल नागरिकों की आवाज दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट की यह टिप्पणी यह साबित करती है कि कई बार पुलिस व्यवस्था कानून-व्यवस्था संभालने के बजाय रसूखदारों के दबाव में काम करने लगती है।

उदासीनता की हदें: मालवानी पुलिस और न्याय का लंबा इंतजार

‘संसद वाणी’ द्वारा पहले भी उजागर किए गए जमीनी मामले इस प्रशासनिक ढिलाई की गवाही देते हैं। मालवानी पुलिस की तत्कालीन अधिकारी अमृता देशमुख के विरुद्ध एक मामूली एनसी (NC) दर्ज करने में ही तीन महीने का लंबा समय लगा दिया गया। इसके बाद पीड़ित पक्ष द्वारा पुलिस आयुक्त कार्यालय तक गुहार पहुँचाने के बावजूद एक साल से अधिक समय तक कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं होना, पुलिस की आंतरिक जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

अधिकारी का रूटीन ट्रांसफर तो हो गया, लेकिन लापरवाही बरतने वाले तंत्र पर कोई ठोस विभागीय एक्शन अब तक पेंडिंग है। सवाल यह उठता है कि क्या वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के कार्यालयों में आम आदमी की शिकायतें केवल फाइलों का वजन बढ़ाने के लिए आती हैं?

जनसेवक का दायित्व या व्यवस्था का दबाव?

सिविल सेवा के नियमों के अनुसार, हर अधिकारी का यह दायित्व है कि वह बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के निष्पक्ष रूप से कानून का पालन कराए। लेकिन मलाईदार पोस्टिंग, मनचाहे तबादलों और प्रमोशन की इस दौड़ ने व्यवस्था को इस कदर प्रभावित किया है कि अधिकारी अक्सर जनहित के मुद्दों को दरकिनार कर केवल सत्ताधारी ताकतों के मौखिक आदेशों की भागा-दौड़ी में लग जाते हैं।

यदि प्रशासनिक तंत्र नेताओं के रसूख के आगे झुकने के बजाय संविधान के प्रति अपनी निष्ठा रखे, तो शायद आज मुंबई की सड़कों पर आम आदमी खुद को और अधिक सुरक्षित महसूस करता।

यह आरोप नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता पर कड़ा सवाल है

यह विश्लेषण किसी व्यक्ति विशेष पर व्यक्तिगत हमला या दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी नहीं है, बल्कि पुलिस प्रशासन की उस कार्यशैली पर एक गंभीर समीक्षात्मक सवाल है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर कर रही है। देश की माननीय अदालतें भी बार-बार पुलिस को उसकी वास्तविक जिम्मेदारियां याद दिला रही हैं। अब समय आ गया है कि पुलिस के शीर्ष नेतृत्व को इस दिशा में आत्म-चिंतन (Self-Introspection) करना होगा, क्योंकि जनता के विश्वास और निष्पक्षता के बिना कोई भी प्रशासनिक व्यवस्था लंबे समय तक अपनी साख नहीं बचा सकती।

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