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मुंबई / बुलढाणा: महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में स्थित लोनार लेक — जो दुनिया की एकमात्र उल्कापिंड झील (meteor crater lake) है — में जलस्तर में पिछले कई महीनों से लगातार वृद्धि देखी जा रही है। स्थानीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, ताजे पानी के निरंतर बहाव के कारण इस झील का जलस्तर लगभग 15 से 20 फीट तक बढ़ गया है, जिससे यह एक गंभीर पर्यावरणीय संकट बन गया है।
झील का महत्व और मौजूदा स्थिति
लोनार झील लगभग 50,000 साल पहले एक उल्कापिंड के टकराने से बनी थी और यह अपने अनूठे क्षारीय-खारे पानी तथा वैज्ञानिक और जैविक अनुसंधान के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह स्थल राष्ट्रीय भू-आधारिक स्मारक और रैमसर साइट के रूप में भी मान्यता प्राप्त है।
हालांकि यह झील पारंपरिक रूप से खारे पानी वाली थी, पिछले वर्षों में चारों ओर से बहने वाले बारहमासी झरनों और भू-जल के अनपेक्षित प्रवेश ने इसमें मीठे पानी का मिश्रण बढ़ा दिया है। इसी वजह से उसका मौलिक रासायनिक संतुलन प्रभावित हो रहा है।
पर्यावरण और सांस्कृतिक धरोहर पर प्रभाव
जलस्तर बढ़ने से झील के तट पर बने कई प्राचीन मंदिर अब जलमग्न हो चुके हैं। इन मंदिरों में से एक विश्वप्रसिद्ध कमलजा देवी मंदिर का गर्भगृह भी पानी के भीतर चला गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल स्तर में इतना तेज़ी से वृद्धि होना झील के जैव विविधता, पारंपरिक क्षारीय पारिस्थितिकी और माइक्रोबियल जीवन के लिए गंभीर खतरा है। संभावित बदलावों के कारण वहां अब पहली बार मछलियों के देखे जाने जैसे असामान्य संकेत भी सामने आए हैं, जो झील के प्राकृतिक तत्त्वों के लिए चिंताजनक हैं।
कानूनी और प्रशासनिक कदम
इस मामले पर बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका (PIL) दायर करने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने झील की रक्षा के लिए विस्तृत रिपोर्ट और सुझाव माँगे हैं, जिससे इस संकट का स्थायी समाधान खोजा जा सके।
सरकारी निरीक्षण दल द्वारा भी स्थल का मूल्यांकन किया जा रहा है और वैज्ञानिक समुदाय द्वारा इसके कारणों तथा दीर्घकालिक प्रभावों पर गहन शोध की आवश्यकता जताई जा रही है।
आगे की राह
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ताजे पानी का लगातार प्रवेश यदि जारी रहा तो लोनार झील का पारिस्थितिक संतुलन अस्थायी रूप से बदल सकता है, जिससे यह प्राकृतिक चमत्कार और सांस्कृतिक धरोहर खतरे में पड़ सकती है।