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सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु पर कानून बनाने के लिए केंद्र से कहा

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नई दिल्ली | 12 मार्च 2026

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु (Euthanasia) को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार से इस विषय पर स्पष्ट और व्यापक कानून बनाने की जरूरत बताई है। कोर्ट ने कहा कि इस संवेदनशील मुद्दे पर अभी तक कोई ठोस कानून नहीं होने से “कानूनी खालीपन” (legislative vacuum) बना हुआ है, जो जनहित के लिए सही नहीं है।


क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि:

  • इच्छामृत्यु जैसे गंभीर मुद्दे पर सिर्फ न्यायालय के दिशानिर्देश पर्याप्त नहीं हैं।
  • संसद को इस विषय पर स्पष्ट कानून बनाना चाहिए ताकि मरीजों, डॉक्टरों और परिवारों के लिए स्पष्ट प्रक्रिया तय हो सके।
  • वर्तमान स्थिति में न्यायालय को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, जो आदर्श स्थिति नहीं है।

हालिया फैसले से जुड़ा मामला

यह टिप्पणी हाल ही में दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले के दौरान आई, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में पड़े मरीज हरीश राणा के लिए जीवन रक्षक प्रणाली हटाने (Passive Euthanasia) की अनुमति दी।

  • यह भारत में इस तरह का पहला बड़ा व्यावहारिक मामला माना जा रहा है
  • कोर्ट ने “गरिमा के साथ मरने का अधिकार” (Right to die with dignity) को अहम बताया

भारत में इच्छामृत्यु की वर्तमान स्थिति

भारत में इच्छामृत्यु को लेकर कानून पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन:

  • Passive Euthanasia (निष्क्रिय इच्छामृत्यु):
    कुछ शर्तों के तहत अनुमति (जैसे लाइफ सपोर्ट हटाना)
  • Active Euthanasia (सक्रिय इच्छामृत्यु):
    अभी भी गैरकानूनी
  • 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने “Right to die with dignity” को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मान्यता दी थी

क्यों जरूरी है नया कानून?

कोर्ट ने चिंता जताई कि:

  • बिना कानून के फैसले गलत तरीके से प्रभावित हो सकते हैं (जैसे आर्थिक दबाव)
  • मरीजों के अधिकार और सुरक्षा खतरे में पड़ सकते हैं
  • डॉक्टरों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं

आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब यह उम्मीद की जा रही है कि केंद्र सरकार:

  • इच्छामृत्यु पर स्पष्ट और व्यापक कानून बनाएगी
  • मरीजों के अधिकार, मेडिकल प्रक्रिया और कानूनी सुरक्षा को परिभाषित करेगी

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