महाराष्ट्र के पालघर जिले से आई एक खबर ने पूरे देश को सदमे में डाल दिया है। यह सिर्फ एक औद्योगिक हादसा नहीं, बल्कि एक परिवार का बुझता चिराग और 18 अन्य जिंदगियों की बेचैनी भरी कहानी है, जो मौत के मुहाने से लौटकर अस्पताल के बिस्तरों पर संघर्ष कर रहे हैं।
मंगलवार को पालघर के वसई इलाके में एक पुराने क्लोरीन गैस सिलेंडर से हुए भीषण रिसाव ने शांतिपूर्ण दोपहर को अचानक मातम में बदल दिया। हवा में घुली यह जहरीली गैस मानो साक्षात मृत्यु बनकर आई।
एक अनमोल जीवन का अंत
इस दर्दनाक घटना में, देव कांतिलाल पर्डीवाल नामक एक 59 वर्षीय व्यक्ति की दुखद मृत्यु हो गई। कौन जानता था कि एक सामान्य दिन उनकी जिंदगी का आखिरी दिन होगा? उनकी अचानक और क्रूर मौत ने उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ तोड़ दिया है। उनकी पत्नी, जो स्वयं भी गैस की चपेट में आने से आईसीयू में भर्ती हैं, उन्हें क्या पता होगा कि अब उनका जीवनसाथी हमेशा के लिए उनसे दूर जा चुका है।
यह केवल एक आंकड़े की बात नहीं है; यह एक इंसान था जिसके सपने थे, परिवार था, और जिसे अब यह समुदाय हमेशा याद रखेगा।
ज़िन्दगी बचाने वाले भी ज़ख्मी
हादसे की भयावहता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दूसरों की जान बचाने दौड़े फायर ब्रिगेड के 5 जाँबाज जवान भी इस जानलेवा गैस की चपेट में आ गए। अपनी जान जोखिम में डालकर उन्होंने रिसाव को नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन ज़हरीले धुएँ ने उन्हें भी नहीं बख्शा। आज ये हीरो खुद अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं।
कुल मिलाकर, एक बच्चा, दो किशोरियां, पांच महिलाएं और ये साहसी फायरमैन सहित 18 लोग अस्पताल में भर्ती हैं। सांस लेने में तकलीफ, आँखों में जलन और उल्टी जैसी शिकायतें लिए ये लोग जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे हैं।
सवाल बाकी हैं…
यह घटना हमें एक बार फिर सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर ऐसी लापरवाही कब तक जारी रहेगी? 10-15 साल पुराना बताया जा रहा यह सिलेंडर क्यों उपेक्षित पड़ा था? क्या हमारी सुरक्षा प्रणालियों में इतना बड़ा छेद है कि एक ज़हरीला रिसाव पूरे इलाके की हवा को ज़हर में बदल सकता है?
यह त्रासदी हमें याद दिलाती है कि विकास की तेज़ दौड़ में, हम अपने पर्यावरण और सबसे ज़रूरी, मानव जीवन के प्रति कितने उदासीन हो गए हैं। इस दुःखद घड़ी में, हम पीड़ित परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना करते हैं।

