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मुंबई: मालाड (पश्चिम) के एरंगळ विलेज में अपने ही घर से बाहर निकलने के बुनियादी हक (राइट टू वे) के लिए एक पीड़ित महिला, नेहा निलेश वालावलकर, पिछले एक साल से दर-दर की ठोकरें खा रही हैं। लेकिन, अब इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाला मोड़ आ गया है। जनता के सेवक कहे जाने वाले डिप्टी कलेक्टर, विनायक पाडवी, खुद ‘लापता’ हो गए हैं!
सवाल यह नहीं कि रास्ता बंद क्यों है, सवाल यह है कि ‘अधिकारी’ कहाँ हैं?
वशिष्ठ मीडिया हाउस के संस्थापक और ‘संसद वाणी’ के मालिक अभिषेक अनिल वशिष्ठ ने जब इस तानाशाही के खिलाफ अपनी लीगल टीम के माध्यम से डिप्टी कलेक्टर विनायक पाडवी को नोटिस भेजने का प्रयास किया, तो एक नया ‘खेल’ सामने आया। गोरेगांव का उनका कार्यालय, जो कभी जनता की समस्याओं का केंद्र हुआ करता था, अब या तो ‘री-डेवलपमेंट’ में खो गया है या फिर प्रशासन की बदनीयती की भेंट चढ़ गया है।
अब सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि कार्यालय शायद दहिसर शिफ्ट हो गया है, लेकिन हकीकत यह है कि न तो फोन उठता है और न ही कोई आधिकारिक पता बताने को तैयार है।
प्रशासनिक ‘लुका-छिपी’ और लोकतंत्र का मजाक
- जवाबदेही का अभाव: क्या एक डिप्टी कलेक्टर का पता ढूंढना अब आम जनता और मीडिया के लिए किसी जासूसी फिल्म जैसा हो गया है?
- मूकदर्शक प्रशासन: महाराष्ट्र में मराठी मानुष और महिलाओं के हक की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले राजनेताओं और अधिकारियों की नाक के नीचे एक महिला बंधक बनी हुई है। विनायक पाडवी साहब, क्या आपकी कुर्सी इतनी भारी है कि आप जनता की पुकार नहीं सुन सकते?
- दबंगों को खुली छूट: जब ग्राउंड जीरो पर जाकर 48 घंटे का अल्टीमेटम देने वाले अधिकारी खुद ही गायब हो जाएं, तो समझा जा सकता है कि दबंगों के हौसले बुलंद क्यों हैं।
वशिष्ठ मीडिया हाउस की ललकार
हमारी टीम अब इस ‘लापता’ सरकारी तंत्र का पता लगाने में जुटी है। हम सिर्फ एक पता नहीं खोज रहे, हम ‘सुशासन’ का वो पता खोज रहे हैं जो मुंबई की फाइलों में कहीं दबकर रह गया है। डिप्टी कलेक्टर महोदय, कार्यालय चाहे दहिसर में हो या कहीं और, कानूनी नोटिस तो आप तक पहुँचेगा ही।
मुंबई की जनता यह पूछ रही है: क्या सरकारी पद का उपयोग जनता को परेशान करने के लिए है, या अपनी जिम्मेदारी से भागने के लिए?
नेहा वालावलकर को न्याय कब मिलेगा? और जनता के सेवक, जनता के सामने कब आएंगे?