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31 सप्ताह की गर्भवती 14 साल की रेप पीड़िता, अबॉर्शन की इजाजत के बावजूद SC ने वापस लिया फैसला

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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट में ऐसा कम होता है जब किसी मामले पर दिया गया आदेश, वापस ले लिया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने 31 वीक की प्रेग्नेंसी पर अबॉर्शन कराने की मंजूरी देने वाले फैसले को पलट लिया है. क्या है वजह, जानिए.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले, कानून और अदालतों की नजर में नजीर होते हैं. ऐसे बेहद कम मामले होते हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट अपने किसी फैसले को पलट दे. 31 सप्ताह की गर्भवती एक 14 साल की रेप पीड़िता पर दिए गए एक फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की अपील पर गर्भपात की इजाजत दी थी लेकिन अब उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलटते हुए आदेश वापस ले लिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने 22 अप्रैल को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत एक 31 सप्ताह के गर्भ के गर्भपात की इजाजत दी थी. पीड़िता का रेप हुआ था. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने पीड़िता की मां की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया था. 

सुप्रीम कोर्ट ने लोकमान्य तिलक म्युनिसिपल जनरल हॉस्पिटल एंड मेडिकल कॉलेज से कहा था कि गर्भपात कराएं लेकिन मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर ही इसे कराया जाए. मेडिकल बोर्ड ने कहा कि इस स्टेज में अगर गर्भपात कराया जाता है तो इसका बच्ची की मानसिक और शारीरिक सेहत पर गंभीर और दीर्घकालिक असर पड़ सकता है. यह जोखिम भरा होगा.

पीड़िता की सेहत पर पड़ सकता था गर्भपात का असर

जब कोर्ट ने गर्भपात का आदेश पारित किया, तब पीड़िता की मां असमंजस में पड़ गई कि एक पूर्ण गर्भ का गर्भपात कराएं या उसे बच्चा जनने दें. अगर बच्चा होता है तो उसे किसी को एडॉप्शन के लिए भी दिया जा सकता है. महिला का कहना था कि उसकी बेटी हर हाल में सुरक्षित रहे. 

डॉक्टरों ने कहा कि अगर गर्भपात करते हैं तो बच्ची की सेहत पर असर पड़ सकता है. याचिकाकर्ता के अनिर्णय की स्थिति देखते हुए डॉक्टरों ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्य भाटी से अनुरोध किया कि वे सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध करें और परिस्थिति के बारे में बताएं. प्रेग्नेंसी अब 32वें सप्ताह में पहुंच गई है. 

क्यों सुप्रीम कोर्ट ने पलटा है फैसला?

याचिकाकर्ता के भ्रम को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पीड़िता के मां-बाप और डॉक्टर्स के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की. इसमें पीड़िता के वकील भी मौजूद थे. सुप्रीम कोर्ट ने सभी पहलुओं पर गौर करने के बाद कहा कि पीड़िता के घरवाले चाहते हैं कि बच्चा हो. सुप्रीम कोर्ट ने 22 अप्रैल को दिए गए आदेश को वापस ले लिया. महाराष्ट्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की गठन में गर्भपात कराने की इजाजत दी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर पीड़िता का परिवार, बच्चा पैदा होने के बाद उसे गोद देना चाहता है तो इसके लिए राज्य सरकार मदद करे. बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले ही पीड़िता के मां की याचिका खारिज कर दी थी. हाई कोर्ट का कहना था कि पीड़िता की मेडिकल कंडीशन ऐसी नहीं है कि उसे गर्भपात की इजाजत दी जाए.

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